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डीपीसी अधिनियम-भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के कर्तव्य , शक्तियां और सेवा की शर्तें

अध्याय-I प्रारम्भिरक

भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक की सेवा की शर्तें को अवधारित करने और उसके कर्तव्यों तथा शक्तियों को निर्धारित करने और उनसे सम्बन्धित या उससे अनुषंगी मामलों के लिए एक अधिनियम ।

भारतीय गणतंत्र के बाईसवें वर्ष में इसका संसद द्वारा निम्न प्रकार से अधिनियमन किया जाएः :-

1. संक्षिप्त शीर्षक

इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (कर्त्तव्य, शक्तियां तथा सेवा शर्ते) अधिनियम, 1971 है।

2. परिभाषाएं

इस अधिनियम में जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-

  1. "लेखे"किसी सरकार के वाणिज्यिक उपक्रमों के संबंध में "लेखे" के अन्तर्गत व्यवसाय, विनिर्माण तथा लाभ एवं हानि लेखे तथा तुलन-पत्र और अन्य सहायक लेखे भी हैं;
  2. "विनियोग लेखे" से वे लेखे अभिप्रेत हैं जो किसी वित्तीय वर्ष के दौरान लेखे में लाए गए व्यय को संविधान के अथवा संघ राज्य क्षेत्र शासन अधिनियम, 1963 (1963 का 20) के उपबंधों के अनुसार, यथास्थिति, भारत की या किसी राज्य की, या ऐसे संघ राज्य क्षेत्र की जिसमें विधान सभा हो, संचित निधि में से धन के विनियोग के लिये बनाई गई विधि में विनिर्दिष्ट विभिन्न मदों से संबद्ध करते हैं;
  3. "नियंत्रक-महालेखापरीक्षक" से संविधान के अनुच्छेद 148 के अधीन नियुक्त भारत का नियंत्रक-महालेखापरीक्षक अभिप्रेत है;
  4. "राज्य" से संविधान की प्रथम अनुसूची में विनिर्दिष्ट कोई राज्य अभिप्रेत है ;
  5. "संघ"के अंतर्गत कोई संघ राज्यक्षेत्र आता है, चाहे उसमें विधान सभा हो या न हो।

अध्याय-II नियंत्रक - महालेखापरीक्षक का वेतन और सेवा की अन्य शर्तें

3.  नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को सर्वोच्चष न्यायालय के न्यायाधीश के वेतन के बराबर वेतन दिया जाएगा:

परन्तु यदि कोई व्यक्ति नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के रूप में पद ग्रहण करने की तारीख के ठीक पूर्व संघ की सरकार के या उसकी पूर्ववर्ती सरकारों में से किसी के अधीन, या किसी राज्य की सरकार के या उसके पूर्ववर्ती सरकारों में से किसी के अधीन, किसी पूर्ववर्ती सेवा की बाबत ( विकलांगता या क्षत पेंशन से भिन्न) कोई पेंशन प्राप्त कर रहा था, या, प्राप्त करने के लिये पात्र होते हुए उसने ऐसी पेंशन लेने का निश्चय किया था, तो नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के रूप में सेवा की बाबत उसके वेतन में से निम्नलिखित को घटा दिया जाएगा अर्थात् :-

  1. उस पेंशन की रकम; और
  2. यदि पद ग्रहण करने के पूर्व उसने ऐसे पूर्ववर्ती सेवा की बाबत उसे देय पेंशन के किसी भाग के बदले में उसका सारांशीकृत मूल्य प्राप्त कर लिया था तो पेंशन के उस भाग की रकम

पदावधि
4.

नियंत्रक-महालेखापरीक्षक उस तारीख से जिसको वह ऐसा पद ग्रहण करता है, छह वर्ष की अवधि के लिये पद धारण करेगाः

परन्तु जहां वह छह वर्ष की उक्त अवधि के अवसान के पूर्व पैंसठ वर्ष की आयु प्राप्त कर लेता है वहां वह ऐसा पद उस तारीख को रिक्त कर देगा जिसको वह उक्त आयु प्राप्त कर लेता है

प्रावधान करता है कि वह, किसी भी समय, राष्ट्रपति को सम्बोधित स्वहस्ताक्षरित लेख द्वारा अपना पद त्याग सकेगा।

स्पष्टीकरण:-इस धारा के प्रयोजन के लिये, उस नियंत्रक-महालेखापरीक्षक की बाबत जो इस अधिनियम के प्रारम्भ के ठीक पूर्व पद धारण कर रहा हो, छह वर्ष की अवधि उस तारीख से संगणित की जाएगी जिसको उसने पद ग्रहण किया था।

अवकाश
5.

  1. किसी व्यक्ति को जो नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के रूप में पद ग्रहण करने की तारीख के ठीक पूर्व सरकार की सेवा में था, उसके पद की अवधि के दौरान न कि उसके पश्चात् उन नियमों के अनुसार छुट्टी मंजूर की जा सकेगी जो उस सेवा को तत्समय लागू हो जिसमें वह ऐसी तारीख के पूर्व था और धारा 6 में अन्तर्विष्ट किसी बात को होते हुए भी वह ऐसी तारीख को अपने नाम जमा छुट्टी का अग्रेषण करने का हकदार होगा।
  2. किसी अन्य व्यक्ति को जिसे नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के रूप में नियुक्त किया जाता है ऐसे नियमों के अनुसार छुट्टी मंजूर की जा सकेगी जो भारतीय प्रशासनिक सेवा के किसी सदस्य को तत्समय लागू हैं।
  3. नियंत्रक-महालेखापरीक्षक की छुट्टी मंजूर करने या नामंजूर करने की या उसे मंजूर की गई छट्टी को प्रतिसंहृत या कम करने की शक्ति, राष्ट्रपति में निहित होगी।

पेंशन
6.

  1. किसी व्यक्ति के बारे में, जो नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के रूप में पद ग्रहण करने की तारीख के ठीक पूर्व सरकार की सेवा में था, यह समझा जाएगा कि वह उस सेवा में उस तारीख को निवृत्त हो गया जिसको वह नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के रूप में पद ग्रहण करता है किंतु नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के रूप में उसकी सेवा चालू रहने वाली अनुमोदित सेवा मानी जाएगी जिसे उस सेवा में पेशन के लिये गणना में लिया जाएगा जिसमें वह था।
  2. हर एक व्यक्ति, जो नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के रूप में पद ग्रहण करता है, उक्त पद को छोड़ने पर, प्रति वर्ष पन्द्रह हजार रूपये की राशि की पेंशन का पात्र होगा जिस राशि में उसे संदेय सभी पेंशनों का, उसकी पेंशन के संराशीकृत प्रभाग का, यदि कोई हो, तथा उस सेवा को, जिसमें वह था, तत्समय लागू नियमों के अधीन उसे अनुज्ञेय निवृत्ति उपदान के, यदि कोई हो, समतुल्य पेंशन का योग सम्मिलित होगा:
    परन्तु यदि ऐसा व्यक्ति उस सेवा को, जिसमें वह था तत्समय शासित करने वाले नियमों के अधीन, उक्त पन्द्रह हजार रूपये की राशि से उच्चतर पेंशन का पात्र है या किसी समय हो जाता है तो वह पेंशन के रूप में उक्त उच्चतर रकम लेने का पात्र होगा।
  3. कोई व्यक्ति, जो नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के रूप में पद ग्रहण करने की तारीख के ठीक पूर्व सरकार के अधीन किसी पूर्ववर्ती सेवा की बाबत कोई पेंशन पा रहा था, या पाने का पात्र हो गया था, नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के रूप में पद छोड़ने पर प्रति वर्ष पन्द्रह हजार रूपये की पेंशन का पात्र होगा जिस राशि में उसे संदेय सभी पेंशनों, उसकी पेंशन के संराशीकृत प्रभाग का, यदि कोई हो, और उस सेवा को जिसमें वह था तत्समय लागू नियमों के अधीन उसे अनुज्ञेय निवृत्ति उपदान के, यदि काई हो, समतुल्य पेंशन का योग सम्मिलित होगाः
    परन्तु यदि ऐसा व्यक्ति उस सेवा को, जिसमें वह था, तत्समय शासित करने वाले नियमों के अधीन उक्त पंद्रह हजार रूपये की राशि से उच्चतर पेंशन का पात्र है या किसी समय हो जाता है तो वह पेंशन के रूप में उक्त उच्चतर रकम लेने का पात्र होगा।
  4. कोई अन्य व्यक्ति, जो नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के रूप में नियुक्त किया जाता है, उक्त पद को छोड़ने पर प्रति वर्ष पन्द्रह हजार रूपये की पेंशन का पात्र होगा।
  5. इस अधिनियम के प्रारम्भ के ठीक पूर्व नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के रूप में पद धारण करने वाला व्यक्ति, स्वविकल्पानुसार, या जो उस दर से जिससे इस अधिनियम के प्रवृत्त न होने की दशा में उसे पेंशन अनुज्ञेय होती या इस धारा में विनिर्दिष्ट दर से पेंशन लेने का पात्र होगा।
  6. कोई व्यक्ति, जो नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के रूप में पद त्यागपत्र द्वारा छोड़ता है, इस प्रकार छोड़ने पर, नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के रूप में अपनी सेवा के प्रत्येक पूरे वर्ष के लिये दो हजार रूपये प्रतिवर्ष की दर से पेंशन का पात्र होगाः

    परन्तु उपधारा (1) या उपधारा (3) में निर्दिष्ट व्यक्ति की दशा में, इस उपधारा के अधीन अनुज्ञेय पेंशन की कुल रकम उसकी पेंशन के संराशीकृत प्रभाग, यदि कोई हो, के सहित पेंशन की रकम, तथा उस सेवा को, जिसमें वह नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के रूप में पद ग्रहण करने के ठीक पूर्व था, तत्समय लागू नियमों के अधीन उसे अनुज्ञेय निवृत्ति उपदान, यदि कोई हो, के समतुल्य पेंशन को सम्मिलित करते हुए प्रति वर्ष पंद्रह हजार रूपये या, यथास्थिति, उपधारा (2) या उपधारा (3) के परन्तुक में निर्दिष्ट उच्चतर पेंशन से अधिक नहीं होगी।

    (6क) इस धारा के पूर्वगामी उपबन्धों में किसी बात के होते हुए भी, उपधारा (1) में निर्दिष्ट ऐसा कोई व्यक्ति, जो नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (कर्त्तव्य, शक्तियां तथा सेवा की शर्ते) संशोधन अधिनियम, 1984 के प्रारंभ के पश्चात् नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के रूप में पद (चाहे उपधारा (8) में विनिर्दिष्ट किसी रीति से या त्यागपत्र द्वारा) छोड़ता है, इस प्रकार छोडने पर–:

    1. उस पेंशन का हकदार होगा जिसका हकदार वह उस सेवा के नियमों के अधीन, जिसमें वह था, नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के रूप में अपनी सेवा की ऐसी सेवा में पेंशन के लिये गिनी जाने वाली निरंतर अनुमोदित सेवा के रूप में संगणना करके हकदार हुआ होता; और
    2. नियंत्रक-महालेखापरीक्षक रूप में सेवा के प्रत्येक पूरे वर्ष के बाबत सात सौ रूपये प्रति वर्ष की विशेष पेंशन का हकदार होगा;
      (6ख) इस धारा के पूर्वगामी उपबन्धों में किसी बात के होते हुए भी, उपधारा (3) में निर्दिष्ट ऐसा कोई व्यक्ति जो नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (कर्तव्य, शक्तियां तथा सेवा की शर्ते) संशोधन अधिनियम, 1984 के प्रारम्भ के पश्चात नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के रूप में पद (चाहे उपधारा (8) में विनिर्दिष्ट किसी रीति से या त्यागपत्र द्वारा) छोड़ता है, इस प्रकार छोडने पर-
       
    3. सरकार के अधीन किसी पूर्वतन सेवा की बाबत अपने को संदेय पेंशन का हकदार होगा; और 
    4. नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के रूप में सेवा के प्रत्येक पूरे वर्ष की बाबत सात सौ रूपये प्रतिवर्ष की विशेष पेंशन का हकदार होगा।

(6ग) इस धारा के पूर्वगामी उपबन्धों में किसी बात के होते हुए भी2, कोई व्यक्ति, जो नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (कर्तव्य, शक्तियां तथा सेवा की शर्ते) संशोधन अधिनियिम, 1987 के प्रारंभ के पश्चात् नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के रूप में पद (चाहे उपधारा (8) में निर्दिष्ट किसी रीति से या त्यागपत्र द्वारा) छोड़ता है, तो इस प्रकार पद छोड़ने पर वह –

        5. एक पेंशन जो सर्वोच्च न्याययालय के न्यानयाधीश को देय पेंशन के बराबर होगी:-

  1. यदि ऐसा व्यक्ति उपधारा (1) या उपधारा (3) में निर्दिष्ट व्यक्ति है तो, समय समय पर यथा संशोधित उच्चतम न्यायालय न्यायाधीश (सेवा शर्ते) अधिनियम, 1958 (जिसे इसमें इसके पश्चात् उच्चतम न्यायालय न्यायाधीश अधिनियम कहा गया है) की अनुसूची के भाग 3 के प्रावधानों के अनुसार; और
  2. यदि ऐसा व्यक्ति उपधारा (4) में निर्दिष्ट व्यक्ति है तो, समय समय पर यथा संशोधित, उच्चतम न्यायालय न्यायाधीश अधिनियम की अनुसूची के भाग I के प्रावधानों के अनुसार,

6.  ऐसी पेंशन (जिसके अंतर्गत पेंशन का सारांशीकरण है), कुटुंब पेंशन और उपदान का, जो समय समय पर यथा संशोधित, उच्चतम न्यायालय न्यायाधीश अधिनियम और उसके अधीन बनाए गए नियमों के अधीन उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को अनुज्ञेय है, हकदार होगा।
(6घ) इस धारा के पूर्वगामी उपबन्धों में किसी बात के होते हुए भी, कोई व्यक्ति, जिसने 16 दिसंबर 1987 के पहले किसी समय नियंत्रक-महालेखापरीक्षक पद (चाहे उपधारा (8) में निर्दिष्ट किसी रीति से या त्यागपत्र द्वारा) छोड़ा है, उस तिथि को और उस तिथि से उप धारा 6(ग) में विनिर्दिष्ट पेंशन का हकदार होगा।

7.  यदि नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के रूप में पद छोड़ने वाला कोई व्यक्ति इस धारा के अधीन किसी पेंशन का पात्र नहीं है किन्तु उस सेवा को, जिसमें वह नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के रूप में पद ग्रहण करने के ठीक पूर्व था, तत्समय लागू नियमों के अधीन पेंशन का पात्र है तो वह, उस धारा में किसी बात के होते हुए भी, ऐसी पेंशन लेने का पात्र होगा जो उसे उक्त नियमों के अधीन अनुज्ञेय है।

8.  नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के रूप में पद धारण करने वाले व्यक्ति के बारे में उस दशा के सिवाय जब वह त्याग-पत्र द्वारा अपना पद छोड़ता है, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिये, यह तभी समझा जाएगा कि उसने उस रूप में ऐसा पद छोड़ दिया है जब –

  • उसने धारा 4 में विनिर्दिष्ट पदावधि पूरी कर ली है; अथवा
  • उसने पैंसठ वर्ष की आयु प्राप्त कर ली है; अथवा
  • चिकित्सक द्वारा यह प्रमाणित कर दिया जाता है कि उसका पद छोड़ना उसकी अस्वस्थता के कारण आवश्यक है।

7. लोप किया गया

साधारण भविष्य निधि में अभिदान करने का अधिकार

8  नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के रूप में पद धारण करने वाला प्रत्येक व्यक्ति साधारण भविष्य निधि (केन्द्रीय सेवा) में अभिदान करने का हकदार होगा। .

सेवा की अन्य शर्तें

9  इस अधिनियम में जैसा अन्यथा उपबन्धित है उसके सिवाय, यात्रा भत्ता, किराया मुक्त मकान की सुविधा और ऐसे किराया मुक्त मकान के मूल्य पर आय कर के संदाय से छूट यातायात सुविधाएँ, सत्कार भत्ता और चिकित्सा सुविधा से संबंधित सेवा की शर्तें तथा सेवा की ऐसी अन्य शर्तें जो उच्चतम न्यायालय न्यायाधीश अधिनियम के अध्याय 4 और उसके अधीन बनाए गए नियमों के अधीन उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को तत्समय लागू हैं जहां तक हो सके, किसी सेवारत या सेवानिवृत्त नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को लागू होंगी।

परन्तु इस धारा की किसी बात का ऐसा प्रभाव नहीं होगा जिससे किसी ऐसे व्यक्ति को, जो नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के रूप में अपना पद ग्रहण करने की तारीख के ठीक पूर्व सरकार की सेवा में था, पूर्वोक्त विषयों में से किसी की बाबत उनसे कम अनुकूल निबंधन प्राप्त हों, जिनका वह उस सेवा के सदस्य के रूप में हकदार होता जिसमें वह था, और ऐसी दशा में नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के रूप में उसकी सेवा, इस परन्तुक के प्रयोजन के लिये, उस सेवा में जिसमें वह था चालू रहने वाली सेवा मानी जाएगी।

अध्याय-III नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के कर्तव्य एवं शक्तियां

नियत्रंक-महालेखापरीक्षक द्वारा संघ एवं राज्यों के लेखाओं का संकलन करना

10.
  1. नियंत्रक-महालेखापरीक्षक निम्नलिखित के लिये जिम्मेदार होगा, अर्थातः-
    1. संघ और हर एक राज्य के लेखाओं का संकलन उन प्रारम्भिक और सहायक लेखाओं से करना जो ऐसे लेखाओं के रखने के लिये जिम्मेदार खजानों, कार्यालयों या विभागों द्वारा उसके नियंत्रण के अधीन लेखापरीक्षा और लेखा कार्यालयों को दिये जाएं; और
    2. खण्ड (क) में विनिर्दिष्ट विषयों में से किसी के संबंध में ऐसे लेखाओं को रखना जो आवश्यक हों:

परन्तु राष्ट्रपति, नियंत्रक-महालेखापरीक्षक से परामर्श करने के पश्चा त् आदेश द्वारा, उसे निम्नलिखित का संकलन करने की जिम्मेदारी से अवमुक्त कर सकेगा-

  1. संघ के उक्त लेखे (या तो तत्काल या विभिन्न आदेश जारी करके धीरे-धीरे); अथवा
  2. संघ की किन्हीं विशिष्ट सेवाओं अथवा विभागों के लेखे:

परन्तु यह और कि किसी राज्य का राज्यपाल, राष्ट्रपति के पूर्व अनुमोदन से और नियंत्रक-महालेखापरीक्षक से परामर्श करने के पश्चाित् आदेश द्वारा, उसे निम्नलिखित का संकलन करने की जिम्मेदारी से अवमुक्त कर सकेगा।

  1. राज्य के उक्त लेखे (या तो तत्काल या विभिन्न आदेश जारी करके धीरे धीरे); अथवा
  2. राज्य की किन्हीं विशिष्ट सेवाओं अथवा विभागों के लेखे:

परन्तु यह भी कि राष्ट्रपति, नियंत्रक-महालेखापरीक्षक से परामर्श करने के पश्चात् आदेश द्वारा उसे किसी विशिष्ट वर्ग या प्रकार के लेखाओं को रखने की जिम्मेदारी से अवमुक्त कर सकेगा।

  • जब, किसी व्यवस्था के अधीन, नियंत्रक-महालेखापरीक्षक से भिन्न कोई व्यक्ति, इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व, निम्नलिखित के लिये जिम्मेदार रहा है, अर्थात् –
  1. संघ या किसी राज्य की किसी विशिष्ट सेवा या विभाग के लेखाओं का संकलन करना; अथवा
  2. किसी विशिष्ट वर्ग या प्रकार के लेखाओं को रखना, तब ऐसी व्यवस्था, उपधारा (1) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी तब तक प्रवृत्त बनी रहेगी
    जब तक कि नियंत्रक-महालेखापरीक्षक से परामर्श करने के पश्चाुत् वह खंड (i) में निर्दिष्ट दशा में यथास्थिति, राष्ट्रपति या राज्य के राज्यपाल के आदेश द्वारा और खंड (ii) में निर्दिष्ट दशा में राष्ट्रपति के आदेश द्वारा प्रतिसंहृत नहीं कर दी जाती।
नियंत्रक-महालेखापरीक्षक का लेखाओं को तैयार करना और राष्ट्रपति को, राज्यों के राज्यपालों को और जिन संघ राज्यक्षेत्रों में विधान सभाएं है उनके प्रशासकों को भेजना।

11.   नियंत्रक-महालेखापरीक्षक अपने द्वारा या सरकार द्वारा या उस निमित्त जिम्मेदार किसी अन्य व्यक्ति द्वारा संकलित किये गये लेखाओं से, हर वर्ष, संबद्ध शीर्षकों के अधीन संघ के प्रत्येक राज्य के और प्रत्येक ऐसे संघ राज्यक्षेत्र के, जिसमें विधान सभा है, प्रयोजनों के लिए, वार्षिक प्राप्तियां और संवितरण दिखाने वाले लेखे (जिनके अंतर्गत, उसके द्वारा संकलित लेखाओं की दशा में, विनियोग लेखे भी है), तैयार करेगा और उन लेखाओं को यथास्थिति, राष्ट्रपति को या राज्यपाल या जिस संघ राज्यक्षेत्र में विधान सभा है, उसके प्रशासक को ऐसी तारीखों को या उनके पूर्व जो वह संबद्ध सरकार की सहमति से अवधारित करे, भेजेगाः

परन्तु राष्ट्रपति, नियंत्रक-महालेखापरीक्षक से परामर्श करने के पश्चात् आदेश द्वारा, उसे संघ के अथवा ऐसे संघ राज्यक्षेत्र के, जिसमें विधान सभा है, प्रयोजन के लिये वार्षिक प्राप्तियों और संवितरणों से संबंधित लेखे तैयार करने और भेजने की जिम्मेदारी से अवमुक्त कर सकेगा।

परन्तु यह और कि किसी राज्य का राज्यपाल, राष्ट्रपति के पूर्व अनुमोदन से और नियंत्रक-महालेखापरीक्षक से परामर्श करने के पश्चाित् आदेश द्वारा, उसे उस राज्य के प्रयोजन के लिये वार्षिक प्राप्तियों और संवितरणों से संबंधित लेखे तैयार करने और भेजने की जिम्मेदारी से अवमुक्त कर सकेगा।

नियंत्रक-महालेखापरीक्षक का संघ और राज्यों को जानकारी देना और उनकी सहायता करना

12. नियंत्रक-महालेखापरीक्षक, जहां तक कि वह उन लेखाओं से जिनके संकलन या रखे जाने के लिये वह जिम्मेदार है समर्थ हो, यथास्थिति, संघ सरकार को, राज्य सरकारों को और उन संघ राज्यक्षेत्रों की सरकारों को जिनमें विधान सभाएं है ऐसी जानकारी देगा जिसकी वे समय-समय पर अपेक्षा करें और उनके वार्षिंक वित्तीय विवरणों की तैयारी में ऐसी सहायता करेगा जिसकी वे उचित रूप से मांग करे।

लेखापरीक्षा के संबंध में साधारण प्रावधान

13. नियंत्रक-महालेखापरीक्षक का यह कर्तव्य होगा कि वह –
  1. भारत की और प्रत्येक राज्य की और प्रत्येक ऐसे संघ राज्यक्षेत्र की जिसमें विधान सभा है, संचित निधि में से किये गये व्यय की लेखापरीक्षा करे और यह अभिनिश्चि,त करे कि क्या वे धनराशियां जो लेखाओं में संवितरित की गई दिखाई गई है, उस सेवा या प्रयोजन के लिये जिसके लिये वे लागू की गई या प्रभावित की गई है वैध रूप से उपलब्ध या लागू थीं और क्या वह व्यय उसे शासित करने वाले प्राधिकार के अनुरूप है;
  2. आकस्मिकता निधि और लोक लेखाओं के संबंध में संघ और राज्यों के सभी संव्यवहारों की लेखापरीक्षा करे;
  3. संघ के या किसी राज्य के किसी विभाग में रखे गये सभी व्यवसाय, विनिर्माण, लाभ और हानि लेखाओं तथा तुलनपत्रों और अन्य सहायक लेखाओं की लेखापरीक्षा करे/और हर एक दशा में अपने द्वारा इस प्रकार लेखापरीक्षित व्यय, संव्यवहारों या लेखाओं की बाबत रिपोर्ट दे।
संघ या राज्य के राजस्वों से पर्याप्त रूप से वित्तपोषित निकायों या प्राधिकरणों की प्राप्तियों तथा व्यय की लेखापरीक्षा

14

  1. जहां किसी निकाय या प्राधिकरण का पर्याप्त वित्तपोषण भारत की या किसी राज्य की या किसी ऐसे संघ राज्यक्षेत्र की जिसमें विधान सभा है, संचित निधि में से अनुदानों या उधारों से किया जाता है, वहां नियंत्रक-महालेखपरीक्षक, यथास्थिति, उस निकाय या प्राधिकरण को लागू तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, उस निकाय या प्राधिकरण की सभी प्राप्तियों तथा व्यय की लेखापरीक्षा करेगा और इस प्रकार अपने द्वारा लेखापरीक्षित प्राप्तियों और व्यय की बाबत रिपोर्ट देगा।

    स्पष्टीकरण: - जहां भारत की या किसी राज्य की या किसी ऐसे संघ राज्यक्षेत्र की जिसमें विधान सभा है, संचित निधि में से किसी निकाय या प्राधिकरण को दिया गया अनुदान या उधार किसी वित्तीय वर्ष में पचीस लाख5 रूपये से कम नहीं है और ऐसे अनुदान या उधार की रकम उस निकाय या प्राधिकरण के कुल व्यय के पचहत्तर प्रतिशत से कम नहीं है, वहां इस उपधारा के प्रयोजनों के लिये यह समझा जाएगा कि उस निकाय या प्राधिकरण का पर्याप्त वित्तपोषण, यथास्थिति, ऐसे अनुदानों या उधारों से किया जाता है।

  2. उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, नियंत्रक-महालेखापरीक्षक, यथास्थिति, राष्ट्रपति या किसी राज्य के राज्यपाल या ऐसे संघ राज्य क्षेत्र के, जिसमें विधान सभा है, प्रशासक के पूर्व अनुमोदन से किसी निकाय या प्राधिकरण को, जहां ऐसे निकाय या प्राधिकरण को, यथास्थिति भारत की या किसी राज्य की या किसी ऐसे संघ राज्यक्षेत्र की, जिसमें विधान सभा है, संचित निधि में से किसी वित्तीय वर्ष में दिए गए अनुदान या उधार एक करोड़ रूपये से कम नहीं है, वहां सभी प्राप्तियों और व्यय की लेखापरीक्षा कर सकेगा।
  3. जहां किसी निकाय या प्राधिकरण की प्राप्तियों और व्यय, की उपधारा (1) या उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट बातों की पूर्ति के फलस्वरूप, किसी वित्तीय वर्ष में नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा लेखापरीक्षा की जाती है वहां वह उस निकाय या प्राधिकरण की प्राप्तियों और व्यय की लेखापरीक्षा इस बात के होते हुए भी दो वर्ष की अतिरिक्त अवधि तक करता रहेगा कि उपधारा (1) या उपधारा (2) में निर्दिष्ट शर्तें उन दो बाद के वर्षों में से किसी के दौरान पूरी नहीं की जाती है।
अन्य प्राधिकरणों या निकायों को दिये गए अनुदानों या उधारों की दशा में नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के कार्य

15

  1. जहां भारत की या किसी राज्य की या किसी ऐसे संघ राज्य क्षेत्र की जिसमें विधान सभा है, संचित निधि में से कोई अनुदान या उधार किसी विनिर्दिष्ट प्रयोजन के लिये किसी ऐसे प्राधिकरण या निकाय को दिया जाता है जो विदेशी राज्य या अंतर्राष्ट्रीय संगठन नहीं है वहां नियंत्रक-महालेखापरीक्षक उन प्रक्रियाओं की संवीक्षा करेगा जिनसे मंजूरी देने वाला प्राधिकारी उन शर्तों की पूर्ति के बारे में अपना समाधान करता है जिनके अधीन ऐसे अनुदान या उधार दिये गए और इस प्रयोजन के लिये उसे, उस प्राधिकरण या निकाय की बहियों और लेखाओं तक, उचित पूर्व सूचना देने के पश्चारत् पहुंच का अधिकार होगाः

    परन्तु यदि, यथास्थिति, राष्ट्रपति किसी राज्य के राज्यपाल या किसी ऐसे संघ राज्यक्षेत्र के जिसमें विधान सभा है, प्रशासक की यह राय हो कि लोकहित में ऐसा करना आवश्यक है तो वह नियंत्रक-महालेखापरीक्षक से परामर्श करने के पश्चातत् आदेश द्वारा उसे ऐसे अनुदान या उधार प्राप्त करने वाले किसी निकाय या प्राधिकरण की बाबत कोई ऐसी संवीक्षा करने से अवमुक्त कर सकेगा।.

  2. उस दशा के सिवाय जबकि वह, यथास्थिति, राष्ट्रपति, किसी राज्य के राज्यपाल या ऐसे संघ राज्यक्षेत्र के, जिसमें विधान सभा है, के प्रशासक द्वारा ऐसा करने के लिये प्राधिकृत है, नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को, उस समय जबकि वह उपधारा (1) द्वारा उसे प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग कर रहा हो, किसी ऐसे निगम की, जिसे कोई ऐसा अनुदान या उधार दिया जाता है जैसा उपधारा (1) में निर्दिष्ट है, बहियों और लेखाओं तक पहुंच का अधिकार नहीं होगा यदि वह विधि, जिसके द्वारा या जिसके अधीन ऐसा निगम स्थापित किया गया है ऐसे निगम के लेखाओं की लेखापरीक्षा नियंत्रक-महालेखापरीक्षक से भिन्न किसी अभिकरण द्वारा किये जाने का उपबन्ध करती है।
  3. परन्तु ऐसा कोई प्राधिकार तब तक नहीं दिया जाएगा जब तक नियंत्रक-महालेखापरीक्षक से परामर्श नहीं कर लिया जाता और जब तक संबद्ध निगम को उसकी बहियों और लेखाओं तक नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को पहुंच का अधिकार देने की प्रस्थापना की बाबत अभ्यावेदन करने का समुचित अवसर नहीं दे दिया जाता।
संघ की या राज्यों की प्राप्तियों की लेखापरीक्षा

16

नियंत्रक-महालेखापरीक्षक का कर्त्तव्य होगा कि वह उन सभी प्राप्तियों की लेखापरीक्षा करे जो भारत की और प्रत्येक राज्य की और प्रत्येक ऐसे संघ राज्यक्षेत्र की जिसमें विधान सभा है, संचित निधि में संदेय है, और अपना समाधान कर ले कि उस बारे में सभी नियम और प्रकियाएं राजस्व के निर्धारण, संग्रहण और उचित आंबटन की प्रभावपूर्ण जांच पड़ताल सुनिश्चित करने के लिये परिकल्पित है और उसका सम्यक रूप से अनुपालन किया जा रहा है और इस प्रयोजन के लिये लेखाओं की ऐसे परीक्षा करें जो वह ठीक समझे और उनकी बाबत रिपोर्ट दे।

भण्डारों और स्टॉक के लेखाओं की लेखा परीक्षा

17 .नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को संघ या किसी राज्य के किसी कार्यालय या विभाग में रखे गए भण्डारों या स्टॉक के लेखाओं की लेखापरीक्षा करने और उनकी बाबत रिपोर्ट देने का प्राधिकार होगा।

लेखाओं की लेखापरीक्षा के संबंध में नियंत्रक-महालेखापरीक्षक की शक्तियां

18 .

  1. इस अधिनियम के अधीन अपने कर्तव्यों के पालन के संबंध में नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को प्राधिकार होगा कि वह-
    1. संघ के या किसी राज्य के नियंत्रण के अधीन किसी लेखा कार्यालय का निरीक्षण करे जिसके अंतर्गत खजाने और प्रारम्भिक या सहायक लेखाओं को रखने के लिये जिम्मेदार ऐसे कार्यालय भी है, जो उसे लेखे भेजते है;
    2. यह अपेक्षा करे कि कोई लेखे, बहियां, कागजपत्र या अन्य दस्तावेज, जो ऐसे संव्यवहारों के बारे में हों या उनका आधार हो या उनसे अन्यथा सुसंगत हों जिन तक लेखापरीक्षा से संबंधित उसके कर्तव्यों का विस्तार है, ऐसे स्थान पर भेज दिये जाऐ जिसे वह अपने निरीक्षण के लिये नियत करे;
    3. कार्यालय के प्रभारी व्यक्ति ऐसे प्रश्नि पूछे या ऐसी टीका-टिप्पणी करे जो वह ठीक समझे और ऐसी जानकारी मांगे जिसकी उसे किसी ऐसे लेखे या रिपोर्ट की तैयारी के लिए अपेक्षा हो, जिसे तैयार करना उसका कर्तव्य है।
  2. किसी ऐसे कार्यालय या विभाग का प्रभारी व्यक्ति, जिसके लेखाओं का निरीक्षण या लेखापरीक्षा नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा की जानी है, ऐसे निरीक्षण के लिये सभी सुविधाएं देगा और जानकारी के लिये किए गए अनुरोधों की यथासम्भव पूरे तौर पर समुचित शीघ्रता से पूर्ति करेगा।

सरकारी कम्पनियों और निगमों की लेखापरीक्षा

19 .

  1. सरकारी कंपनियों के लेखाओं की लेखापरीक्षा के संबंध में नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के कर्तव्यों और शक्तियों का पालन और प्रयोग उसके द्वारा कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के उपबंधों के अनुसार किया जाएगा।
  2. संसद द्वारा बनाई गई विधि द्वारा या उसके अधीन स्थापित निगमों के (जो कंपनियां न हों) लेखाओं की लेखापरीक्षा के संबंध में नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के कर्तव्यों और शक्तियों का पालन और प्रयोग उसके द्वारा संबंधित विधानों के उपबंधों के अनुसार किया जाएगा।
  3. किसी राज्य का राज्यपाल या किसी ऐसे संघ राज्यक्षेत्र, जिसमें विधान सभा है, का प्रशासक, जब उसकी यह राय है कि लोकहित में ऐसा करना आवश्यक है तब नियंत्रक-महालेखापरीक्षक से अनुरोध कर सकेगा कि वह यथास्थिति, राज्य के या संघ राज्यक्षेत्र के विधान मंडल द्वारा बनाई गई विधि के अधीन स्थापित किसी निगम के लेखाओं की लेखापरीक्षा करे और जब ऐसा अनुरोध किया गया है तब, नियंत्रक-महालेखापरीक्षक ऐसे निगम के लेखाओं की लेखापरीक्षा करेगा और ऐसी लेखापरीक्षा के प्रयोजनों के लिये उसे निगम के लेखाओं और बहियों तक पहुंच का अधिकार होगाः

    परंतु ऐसा कोई अनुरोध तब तक नहीं किया जाएगा जब तक नियंत्रक-महालेखापरीक्षक से परामर्श नहीं कर लिया जाता और जब तक निगम को ऐसी लेखापरीक्षा की प्रस्थापना की बाबत अभ्यावेदन करने का समुचित अवसर नहीं दे दिया जाता।

सरकारी कंपनियों और निगमों के लेखाओं के संबंध में रिपोर्टों का रखा जाना

19 क

  1. धारा 19 में निर्दिष्ट किसी सरकारी कंपनी या किसी निगम के लेखाओं के संबंध में नियंत्रक-महालेखापरीक्षक की रिपोर्टें सरकार को या संबंधित सरकारों को प्रस्तुत की जाएंगी।
  2. केंद्रीय सरकार उपधारा (1) के अधीन अपने द्वारा प्राप्त प्रत्येक रिपोर्ट को, उसके प्राप्त होने के पश्चारत् यथाशीघ्र संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाएगी।
  3. राज्य सरकार उपधारा (1) के अधीन अपने द्वारा प्राप्त प्रत्येक रिपोर्ट को उसके प्राप्त होने के पश्चापत् यथाशीघ्र राज्य के विधान-मंडल के समक्ष रखवायेगी।

    स्पष्टीकरण: - इस धारा के प्रयोजन के लिये ऐसे किसी संघ राज्य क्षेत्र के संबंध में, जिसमें विधान सभा है "सरकार " या "राज्य सरकार " से उस संघ राज्य क्षेत्र का प्रशासक अभिप्रेत है।

कतिपय प्राधिकरणों या निकायों के लेखाओं की लेखापरीक्षा

20

  1. धारा 19 में जैसा अन्यथा उपबंधित है उसके सिवाय, जहां किसी निकाय या प्राधिकरण के लेखाओं की लेखापरीक्षा नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि द्वारा या उसके अधीन नहीं सौंपी गई है, वहां यदि, उससे, यथास्थिति राष्ट्रपति या किसी राज्य के राज्यपाल या किसी ऐसे संघ राज्यक्षेत्र के, जिसमें विधान सभा है, के प्रशासक द्वारा ऐसा करने का अनुरोध किया गया तो वह ऐसे निकाय या प्राधिकरण के लेखाओं की लेखापरीक्षा ऐसे निबंधनों और शर्तों पर करेगा जो उसके और संबद्ध सरकार के बीच अनुबंधित पाए जाएं, और ऐसी लेखापरीक्षा के प्रयोजनों के लिये उस निकाय या प्राधिकरण की बहियों और लेखाओं तक पहुंच का अधिकार होगाः

    परन्तु ऐसा कोई अनुरोध तब तक नहीं किया जाएगा जब तक नियंत्रक-महालेखापरीक्षक से परामर्श नहीं कर लिया जाता।

  2. नियंत्रक-महालेखापरीक्षक, यथास्थिति राष्ट्रपति या किसी राज्य के राज्यपाल या किसी ऐसे संघ राज्यक्षेत्र के जिसमें विधान सभा है, के प्रशासक से किसी ऐसे निकाय या प्राधिकरण के, जिसके लेखाओं की लेखापरीक्षा उसे विधि द्वारा नहीं सौंपी गई है, लेखाओं की लेखापरीक्षा के लिये प्राधिकृत करने की प्रस्थापना उस दशा में कर सकेगा जब उसकी यह राय हो कि ऐसी लेखापरीक्षा इस कारण आवश्यक है कि केन्द्रीय या राज्य सरकार द्वारा या ऐसे संघ राज्यक्षेत्र की, जिसमें विधान सभा है, सरकार द्वारा, ऐसे निकाय या प्राधिकरण में पर्याप्त रकम विनिहित की गई है या उसे उधार दी गई है, और, यथास्थिति, राष्ट्रपति या राज्यपाल या प्रशासक ऐसा अनुरोध किये जाने पर नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को ऐसे निकाय या प्राधिकरण के लेखाओं की लेखापरीक्षा करने के लिये प्राधिकृत कर सकेगा।
  3. उपधारा (1) या उपधारा (2) में निर्दिष्ट लेखापरीक्षा, नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को तब तक नहीं सौंपी जाएगी जब तक, यथास्थिति, राष्ट्रपति या किसी राज्य के राज्यपाल या किसी ऐसे संघ राज्यक्षेत्र के जिसमें विधान सभा है, के प्रशासक का समाधान नहीं हो जाता कि ऐसा करना लोकहित में समीचीन है और जब तक संबद्ध निकाय या प्राधिकरण को ऐसी लेखापरीक्षा की प्रस्थापना के बारे में अभ्यावेदन करने का समुचित अवसर नहीं दे दिया जाता।

अध्याय-IV विविध

नियंत्रक-महालेखापरीक्षक की शक्ति का प्रत्यायोजन

21 . इस अधिनियम या किसी अन्य विधि के उपबंधों के अधीन नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा प्रयुक्त की जाने वाली कोई भी शक्ति उसके विभाग के ऐसे अधिकारी द्वारा प्रयुक्त की जा सकेगी जिसे वह साधारण या विशेष आदेश द्वारा, इस निमित्त प्राधिकृत करे:

परंतु उस दशा के सिवाय जब नियंत्रक-महालेखापरीक्षक छुट्टी पर हो, या अन्यथा अनुपस्थित हो, कोई भी अधिकारी नियंत्रक-महालेखापरीक्षक की ओर से किसी ऐसी रिपोर्ट को भेजने के लिये प्राधिकृत नहीं होगा जिसे, यथा स्थिति राष्ट्रपति या किसी राज्य के राज्यपाल या ऐसे संघ राज्यक्षेत्र के जिसमें विधान सभा है, के प्रशासक को भेजने के लिये नियंत्रक-महालेखपरीक्षक संविधान द्वारा या संघ राज्यक्षेत्र शासन अधिनियम (1963 का 20) द्वारा अपेक्षित है।

नियम बनाने की शक्ति

22

  1. केन्द्र सरकार, नियंत्रक-महालेखापरीक्षक से परामर्श करने के पश्चाात् इस अधिनियम के उपबंधों को, जहां तक वे लेखाओं के रखे जाने से संबंधित हैं, कार्यान्वित करने के लिये राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियम बना सकेगी।
  2. विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित सभी विषयों के लिये या उनमें से किसी के लिये उपबंध कर सकेंगे, अर्थातः-
    1. वह रीति जिसमें लेखापरीक्षा और लेखा कार्यालयों को लेखे देने वाले खजानों, कार्यालयों और विभागों द्वारा प्रारम्भिक और सहायक लेखे रखे जाएंगे;
    2. वह रीति जिसमें संघ के या किसी राज्य के या ऐसी किसी विशिष्ट सेवा या विभाग के या किसी विशिष्ट वर्ग या प्रकार के लेखे, जिनकी बाबत नियंत्रक-महालेखापरीक्षक लेखे संकलित करने या रखने की जिम्मेदारी से अवमुक्त कर दिया गया है, संकलित किये जाएंगे या रखे जाएंगे;
    3. वह रीति जिसमें, यथास्थिति, संघ के या किसी राज्य के किसी कार्यालय या विभाग के भंडारों या स्टॉक के लेखे रखे जाएंगे;
    4. कोई अन्य विषय जो नियमों द्वारा विहित किया जाना है या विहित किया जाए।
  3. इस धारा के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चातत् यथाशीघ्र, संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, तीस दिन की अवधि के लिये रखा जाएगा। यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी। यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त अनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिये सहमत हो जाएं तो तत्पश्चादत् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा। यदि उक्तर अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिये तो, तत्पश्चात् वह निष्प्रोभावी हो जाएगा किंतु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्राभाव होने से पहले उसके अधीन की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।
विनियम बनाने की शक्ति

23 .नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को इस अधिनियम के उपबंधों को, जहां तक वे लेखापरीक्षा की परिधि और विस्तार के संबंध में है, जिनके अंतर्गत सरकारी विभागों के मार्गदर्शन के लिये सरकारी लेखे रखने के साधारण सिद्धांत और प्राप्तियों तथा व्यय की लेखापरीक्षा के बारे में सामान्य सिद्धांत भी है, कार्यान्वित करने के लिये विनियम बनाने के लिये इसके द्वारा प्राधिकृत किया जाता है।

ब्यौरेवार लेखापरीक्षा से अभिमुक्त करने की शक्ति

24 .नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को इसके द्वारा प्राधिकृत किया जाता है कि जब भी परिस्थितियों से ऐसा युक्तिसंगत हो, वह किन्हीं लेखाओं या किन्हीं वर्गो के संव्यवहारों की ब्यौरेवार लेखापरीक्षा के किसी भाग से अभिमुक्ति प्रदान कर दे और ऐसे लेखाओं या संव्यवहारों के सम्बन्ध में ऐसी सीमित जांच पड़ताल लागू करे जो वह अवधारित करे।

निरसन

25 .नियंत्रक-महालेखापरीक्षक अधिनियम, 1953 (1953 की सेवा-शर्ते 21) इसके द्वारा निरसित किया जाता है।

शंकाओं का निराकरण

26 .शंकाओं के निराकरण के लिये घोषित किया जाता है कि इस अधिनियिम के प्रारंभ होने पर भारत (अनंतिम संविधान) आदेश, 1947 द्वारा यथानुकूलित भारत सरकार (लेखापरीक्षा और लेखे) आदेश, 1936, किसी ऐसी बात या कार्रवाई के सिवाय, जो उसके अधीन की जा चुकी है, प्रवृत्त नहीं रहेगा।

सीएजी के डीपीसी अधिनियम, 1971 में संशोधन

संशोधन अधिनियम, 1976 का सं. 45-एफ

नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के (कर्तव्यक, शक्तिकयां एवं सेवा की शर्तें) अधिनियम, 1971 में संशोधन के लिए एक अतिरिक्त अधिनियम।

भारत के गणराज्यअ के सत्ताईसवें वर्ष में संसद द्वारा अधिनियम निम्नानुसार है:-  

    1. इस अधिनियम को नियंत्रक-महालेखापरीक्षक का (कर्तव्य , शक्तियों एवं सेवा की शर्तें) संशोधन अधिनियम, 1976 कहा जा सकता है।
    2. इसे मार्च 1976 के प्रथम दिवस से लागू माना जाएगा।
  1. नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के (कर्तव्य, शक्तियां एवं सेवा की शर्तें) अधिनियम 1971 (जिसे यहां बाद में मुख्य् अधिनियम कहा गया) की धारा 10 में, उप-धारा (1) में (क) पहले परन्तुक के लिए निम्नेलिखित परन्तुकों को इनसे बदला जाए। बशर्तें राष्ट्रापति आदेश द्वारा नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के परामर्श के बाद उन्हें संकलन की जिम्मेदारी से मुक्त कर सकता है।
    1. (i) संघ के कथित लेखे (या तो एक बार या क्रमवार कई आदेश जारी कर के); या
    2. किसी विशेष सेवा या संघ के विभागों के लेखें:
      आगे प्रावधान किया जाता है कि एक राज्य का राज्यपाल राष्ट्रपति के पूर्व अनुमोदन से तथा नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के साथ परामर्श के बाद आदेश के द्वारा उसे निम्न‍लिखित के संकलन के उत्तरदायित्व से मुक्त कर सकता है।
    3. राज्य के कथित लेखे (या तो कुछ आदेशों को एक बार अथवा, क्रमवार जारी करके); अथवा
    4. राज्य की किन्ही विशिष्ट सेवाओं अथवा विभागों के लेखें; (ख) दूसरे परन्तुक में ‘’आगे प्रावधान किया गया है’’ शब्दों के लिए ‘’ भी प्रावधान किया गया’’ शब्द बदला जाना चाहिए।
  2. मुख्या अधिनियम की धारा 11 में
    1. ’इसकी ओर से किसी और उत्तरदायी व्यक्ति द्वारा’’ शब्दों के लिए, ‘’राज्यपाल द्वारा या उसकी ओर से उत्तकरदायी कोई और व्यकक्तिय’’ द्वारा शब्दक को बदला जाना चाहिए।
    2. 2. निम्नलिखित परन्तुकों को अंत में शामिल किया जाना चाहिए, नामत:
      प्रावधान किया जाता है कि राष्ट्र पति, नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के साथ परामर्श के बाद, उन्हेंन आदेश द्वारा संघ या केंद्र शासित प्रदेश जिसकी विधान सभा है के वार्षिक प्राप्ति्यों और वितरणों से संबंधित लेखाओं को तैयार और प्रस्तुत करने के उत्तकरदायित्व से मुक्त कर सकता है:
      आगे प्रावधान किया जाता है कि एक राज्यु का राज्यपाल, राष्ट्रपति के पूर्व अनुमोदन के साथ और नियंत्रक महालेखापरीक्षक के साथ परामर्श के बाद, उसे आदेश द्वारा राज्य् के वार्षिक प्राप्ति्यों और वितरणों से संबंधित लेखों की तैयारी और प्रस्तुत करने के उत्तयरदायित्व से मुक्त् कर सकता हैं।
  3. मुख्य धारा के खंड 22 में
    1. उप धारा (2) के खण्ड (ख) में ‘’लेखाओं के’’ शब्दोंं के बाद ‘’संघ या किसी राज्य’ के या के’’ शब्द शामिल किया जाएगा:
    2. उप-धारा (3) में ‘’दो कमिक सत्रों में’’ शब्दों के लिए, ‘’दो या अधिक अनुक्रमिक सत्रों में’’ शब्द. और ‘’सत्र जिनमे इसे प्रस्तुत किया गया या इसके तुरन्त बाद के सत्र में’’ शब्दों को ‘’सत्र के तुरन्तं बाद के सत्र या उक्त क्रमिक सत्र’’ शब्दों से बदला जाए।
    1. भारत के नियंत्रक महालेखापरीक्षक के (कर्तव्य्, शक्तिसयां तथा सेवा की शर्तें) संशोधन अध्यांदेश, 1976 को इसके द्वारा निरस्तर कर दिया गया है।
    2. ऐसे निरसन के बावजूद भी मुख्य अधिनियम के अन्तर्गत कुछ भी किया गया या कोई कार्यवाही की गई, जैसा कि कथित अध्यादेश द्वारा यथा संशोधित हो, इस अधिनियम द्वारा यथा संशोधित मुख्य अधिनियम के अन्त्र्गत किया गया या लिया गया माना जाएगा।

संशोधित अधिनियम, 1984 की सं. 2 (16 मार्च, 1984)

नियंत्रक-महालेखापरीक्षक कर्त्तव्य, शक्तियां और सेवा की शर्तें अधिनियम, 1971 को संशोधित करने के लिये इसके अतिरिक्त अधिनियम किया:-

भारत गणतंत्र के पैंतीसवें वर्ष में इसका संसद द्वारा निम्न प्रकार से अधिनियमित किया:

  1. इस अधिनियम का नाम नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के (कर्त्तव्य, शक्तियां और सेवा की शर्तें) अधिनियम, 1984 कहा जाएं।
  2. नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक कर्त्तव्य, शक्तियां और सेवा की शर्तें अधिनियम 1971 (यहां मुख्य अधिनियम के रूप में संदर्भित) में धारा 6 में, उप-धारा (6) के बाद, निम्नलिखित उप-धारा सम्मिलित होगी अर्थात:-

    (6क) इस धारा के पूर्वगामी उपबन्धों में किसी बात के होते हुए भी, उपधारा (1) में निर्दिष्टन ऐसा कोई व्यक्ति, जो नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के (कर्त्तव्य, शक्तियां और सेवा की शर्तें) संशोधन अधिनियम, 1984 के प्रारंभ के पश्चापत् नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के रूप में पद (चाहे उपधारा (8) में विनिर्दिष्टग किसी रीति से या त्यागपत्र द्वारा) छोड़ता है, इस प्रकार छोड़ने पर निम्नलिखित के हकदार होंगे:-

    1. उस पेंशन का हकदार होगा जिसका वह उस सेवा के नियमों के अधीन, जिसमें वह था, नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के रूप में अपनी सेवा की ऐसी सेवा में पेंशन के लिये गिनी जाने वाली निरंतर अनुमोदित सेवा के रूप में संगणना करके हकदार हुआ होता; और
    2. नियंत्रक-महालेखापरीक्षक रूप में सेवा के प्रत्येक पूरे वर्ष के बाबत सात सौ रूपये प्रति वर्ष की विशेष पेंशन का हकदार होगा; बशर्ते कि इस उप-धारा के खण्डे (क) और खण्डक (ख) के अंतर्गत उसे देय राशि का कुल किसी भी हालत में प्रतिवर्ष बीस हजार और चार सौ रूपये की राशि से अधिक नहीं होगा।

    2.नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के (कर्तव्य, शक्तियां और सेवा की शर्तें [1987 की 50]) संशोधन अधिनियिम, 1987 इस प्रकार पद छोड़ने पर वह निम्नलिखित के हकदार होंगे-

    1. पेंशन जो सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को देय पेंशन के बराबर होगी- (i) यदि ऐसे व्यक्ति उप-धारा (1) या उपधारा (3) में निर्दिष्टा व्यक्ति है तो, समय-समय पर यथा संशोधित उच्चतम न्यायालय न्यायाधीश (सेवा शर्तें) अधिनियम, 1958 (जिसे इसमें इसके पश्चाित् उच्चतम न्यायालय न्यायाधीश अधिनियम उल्लेखित) की अनुसूची के भाग III के प्रावधानों के अनुसार; और (ii) यदि ऐसा व्यक्ति उपधारा (4) में निर्दिष्टश व्यक्ति है तो, समय-समय पर यथा संशोधित, उच्चतम न्यायालय न्यायाधीश अधिनियम की अनुसूची के भाग I के प्रावधानों के अनुसार;
    2. ऐसी पेंशन (पेंशन का रूपान्तरित सहित), परिवार पेंशन और उपदान का, जो समय-समय पर यथा संशोधित, उच्चतम न्यायालय न्यायाधीश अधिनियम और उसके अधीन बनाए गए नियमों के अधीन उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को अनुज्ञेय है, हकदार होगा।

    3.  मुख्य अधिनियम की धारा 7 हटानी होगी।

    4. मुख्य अधिनियम की धारा 9 में प्रारंभिक पैराग्राफ के लिए निम्नलिखित प्रतिस्थापित होगा, नामत:-

    "इस अधिनियम में जैसा अन्यथा उपबन्धित है उसके सिवाय, यात्रा भत्ता, किराया मुक्त मकान की सुविधा और ऐसे किराया मुक्त मकान के मूल्य पर आय कर के अदायगी से छूट यातायात सुविधाएँ, सत्कार भत्ता और चिकित्सा सुविधा से संबंधित सेवा की शर्तें तथा सेवा की ऐसी अन्य शर्ते जो उच्चतम न्यायालय न्यायाधीश अधिनियम के अध्याबय 4 और उसके अधीन बनाए गए नियमों के अधीन उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को तत्समय लागू है जहां तक हो सके, किसी सेवारत या नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को लागू होंगी, जैसा मामला हों।"

संशोधित अधिनियम, 1987 की सं. 50 (16 दिसम्बर, 1987)

नियंत्रक-महालेखापरीक्षक कर्त्तव्य, शक्तियां और सेवा की शर्तें अधिनियम, 1971 को संशोधित करने के लिये इसके अतिरिक्त अधिनियम भारत गणतंत्र के अडतीसवें वर्ष में इसका संसद द्वारा निम्न प्रकार से अधिनियमित किया:-

1. इस अधिनियम का नाम नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (कर्त्तव्य, शक्तियां और सेवा की शर्तें) अधिनियम, 1987 कहा जाए।

2. नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के कर्त्तव्य, शक्तियां और सेवा की शर्तें अधिनियम 1971 (यहां मुख्य अधिनियम के रूप में संदर्भित) में धारा 6 में,-

  1. उप-धारा (6क) और (6ख) में, प्रावधानों को हटाना होगा और 1 जनवरी, 1986 से हटा हुआ माना जायेगा;
  2. उप-धारा (6ख) के बाद, निम्नलिखित उप-धारा को शामिल किया जाएगा, नामत:- (6ग) इस धारा के पूर्वगामी उपबन्धों में किसी बात के होते हुए भी, उपधारा (1) में निर्दिष्टक ऐसा कोई व्यक्ति, जो नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के (कर्त्तव्य, शक्तियां और सेवा की शर्तें) संशोधन अधिनियम, 1984 के प्रारंभ के पश्चा त् नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के रूप में पद (चाहे उपधारा (8) में विनिर्दिष्टक किसी रीति से या त्यागपत्र द्वारा) छोड़ता है।
  3. नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के (कर्तव्य, शक्तियां और सेवा की शर्तें [1987 की 50]) संशोधन अधिनियिम, 1987 इस प्रकार पद छोड़ने पर वह निम्नांकित के हकदार होंगे-

क) पेंशन जो सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को देय पेंशन के बराबर होगी-

(i) यदि ऐसे व्यक्ति उप-धारा (1) या उपधारा (3) में निर्दिष्ट व्यक्ति है तो, समय-समय पर यथा संशोधित उच्चतम न्यायालय न्यायाधीश (सेवा की शर्तें) अधिनियम, 1958 (जिसे इसमें इसके पश्चातत् उच्चतम न्यायालय न्यायाधीश अधिनियम उल्लेखित) की अनुसूची के भाग III के प्रावधानों के अनुसार; और

(ii) यदि ऐसा व्यक्ति उपधारा (4) में निर्दिष्टम व्यक्ति है तो, समय-समय पर यथा संशोधित, उच्चतम न्यायालय न्यायाधीश अधिनियम की अनुसूची के भाग I के प्रावधानों के अनुसार;

(ख) ऐसी पेंशन (पेंशन का रूपान्तरित सहित), परिवार पेंशन और उपदान का, जो समय-समय पर यथा संशोधित, उच्चतम न्यायालय न्यायाधीश अधिनियम और उसके अधीन बनाए गए नियमों के अधीन उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को अनुज्ञेय है, हकदार होगा;

3.  मुख्य अधिनियम की धारा 7 हटानी होगी।

4.  मुख्य अधिनियम की धारा 9 में प्रारंभिक पैराग्राफ के लिए निम्नलिखित प्रतिस्थापित होगा, नामत:- "इस अधिनियम में जैसा अन्यथा उपबन्धित है उसके सिवाय, यात्रा भत्ता, किराया मुक्त मकान की सुविधा और ऐसे किराया मुक्त मकान के मूल्य पर आय कर के अदायगी से छूट यातायात सुविधाएँ, सत्कार भत्ता और चिकित्सा सुविधा से संबंधित सेवा की शर्तें तथा सेवा की ऐसी अन्य शर्ते जो उच्चतम न्यायालय न्यायाधीश अधिनियम के अध्याशय 4 और उसके अधीन बनाए गए नियमों के अधीन उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को तत्समय लागू है जहां तक हो सके, किसी सेवारत या नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को लागू होंगी, जैसा मामला हो।"

संशोधित अधिनियम, 1994 ,की सं. 51 (26 अगस्त, 1994)

नियंत्रक-महालेखापरीक्षक कर्त्तव्य, शक्तियां और सेवा की शर्तें अधिनियम, 1971 को संशोधित करने के लिये इसके अतिरिक्त अधिनियम भारत गणतंत्र के पैंतालीसवें वर्ष में इसका संसद द्वारा निम्न प्रकार से अधिनियमित किया:-

    1. (1) इस अधिनियम का नाम नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के (कर्त्तव्य, शक्तियां तथा सेवा की शर्तें) अधिनियम, 1994 कहा जाएं।
    2. (2) इस अधिनियम की धारा 2 को 27 मार्च, 1990 से लागू माना जाएगा और उसकी धारा 3, 16 दिसम्बर, 1987 से लागू मानी जाएगी।
  1.  नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के (कर्त्तव्य, शक्तियां और सेवा की शर्तें) अधिनियम, 1971 (इसके पश्चात् मुख्य अधिनियम के रूप में संदर्भित) धारा 3 में, परंतुक में-
    1. खण्ड (ख) में, अंत में आने वाले शब्द ‘और’ को हटाना होगा;
    2. खण्ड (ग) को हटाना होगा।
  2.  उप-धारा (6ग) के बाद, मुख्य अधिनियम की धारा 6 में, निम्नलिखित उप-धाराओं को इस प्रकार प्रतिस्थापित किया जाएगा नामत:-
    (6D) (6घ) इस धारा के पूर्वगामी उपबन्धों में किसी बात के होते हुए भी, कोई व्यक्ति, जिसने 16 दिसम्बर 1987 से पहले किसी समय नियंत्रक-महालेखापरीक्षक पद (चाहे उपधारा (8) में निर्दिष्टि किसी रीति से या त्यागपत्र द्वारा) छोड़ा है, उस तिथि को और उस तिथि से उप-धारा 6(ग) में विनिर्दिष्टे पेंशन का हकदार होगा।

महत्वपूर्ण निर्णय

अरविंद गुप्ता बनाम भारतीय संघ
(2013) सर्वोच्च न्यायालय मामला 293 (माननीय न्यायाधीश आर.एम. लोधा एवं अनिल आर. दवे, न्यायाधीश के समक्ष)

निष्पादन लेखापरीक्षा करने के लिये सीएजी की शक्तियां

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्णय लिये गये इस मामले में, प्रार्थी ने प्रस्तुत किया कि भारत के सीएजी को निष्पादन लेखापरीक्षा प्रतिवेदन देने की शक्ति नहीं है और सीएजी (डीपीसी) अधिनियम, 1971 के अंतर्गत बने लेखापरीक्षा और लेखा विनियम, 2007 में प्रावधानों जिसमें सीएजी को निष्पादन लेखापरीक्षा करने की शक्ति दी गई है संविधान का उल्लंघन है।

सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि मितव्ययिता, दक्षता और प्रभावकारिता में जांच करने के लिये सीएजी का कार्य जिससे सरकार ने अपने संसाधनों का प्रयोग किया हो, 1971 अधिनियम में अंतनिर्हित है। विनियमों के अंतर्गत तैयार निष्पादन लेखापरीक्षा प्रतिवेदनों को तदनुसार देखा जाना चाहिये। न्यायालय ने विनियमों में कोई भी असंवैधानिकता नहीं देखी।

निर्णय के निष्कर्ष

2012 की रिट याचिका (सी) संख्याी 393, अक्टूबर 1, 2012 को निर्णय लिया गया।

1.हमने श्री संतोषपॉल, प्रार्थी के विद्वान वकील को सुना। प्रार्थी के लिये विद्वान वकील ने कहा कि भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (सीएजी) के पास निष्पाादन लेखापरीक्षा रिपोर्ट देने की शक्ति नहीं है और नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षा के (कर्त्तव्य, शक्तियां और सेवा की शर्तें) अधिनियम, 1971 (संक्षिप्त के लिये ‘1971 अधिनियम’) के अंतर्गत बने लेखापरीक्षक एवं लेखा, 2007 पर विनियमों (संक्षिप्त के लिये ‘विनियमों’) जो सीएजी को निष्पाादन लेखापरीक्षा करने की शक्ति देता है संविधान का उल्लंघन है।

2.भारत के संविधान के अनुच्छेद 149 में प्रावधान है कि सीएजी संघ और राज्यों और किसी भी प्राधिकरण या निकाय के लेखाओं के संबंध में ऐसे कर्त्तव्य और शक्तियों का प्रयोग करेगें चाहिये जैसा संसद द्वारा बनाये गये किसी भी कानून के अंतर्गत या द्वारा निर्धारित हो। संविधान के अनुच्छेद 149 के पालन में, 1971 अधिनियम अधिनियमित किया गया। 1971 अधिनियम में अन्य प्रावधानों के भीतर, धारा 16 में प्रावधान है कि:
“16 संघ या राज्यों की प्राप्तियों की लेखापरीक्षा- सभी प्राप्तियां जो भारत की समेकित निधि में देय हैं और प्रत्येक राज्य और संघ राज्य क्षेत्र जिसमें विधान सभा हो की सभी प्राप्तियों की लेखापरीक्षा करना और स्वयं को संतुष्ट करना कि इनके लिये बनाये गये नियम और प्रक्रियाऐं राजस्व के मूल्यांकन, एकत्रण और उचित आवंटन पर प्रभावी जांच निश्चित करने के लिये बनाये गये है और पालन किया जा रहा है और इस उद्देश्य के लिये लेखाओं की ऐसी जांच करना जो वो उसके लिये उचित समझे और भविष्य में रिपोर्ट करना भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक का कर्त्तव्य होगा।”

3.मितव्ययिता, दक्षता और प्रभावकारिता में जांच करने के लिये सीएजी का कार्य जिससे सरकार ने अपने संसाधनों का प्रयोग किया हो, 1971 अधिनियम में अंतनिर्हित है। विनियमों के अंतर्गत तैयार निष्पापदन लेखापरीक्षा प्रतिवेदनों को तदनुसार देखा जाना चाहिये। हमने विनियमों में कोई भी असंवैधानिकता नहीं देखी। इसके अतिरिक्त, संविधान के अनुच्छेद 151 में प्रावधान है कि संघ के लेखाओं से संबंधित सीएजी की रिपोर्ट राष्ट्र्पति को प्रस्तुत की जाएगी, जो उन्हें संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष प्रस्तुत करेगा और राज्य के लेखाओं से संबंधित रिपोर्ट राज्य के राज्यपाल को प्रस्तुत की जायेगी जो उन्हें राज्य के विधानमंडल के समक्ष प्रस्तुत करेगा। लेखापरीक्षा रिपोर्ट जो सीएजी द्वारा प्रस्तुत की जाती है, इस प्रकार, संसद या राज्य के विधानमंडल, जैसा भी मामला हो द्वारा संवीक्षा के अधीन हैं।

4.रिट याचिका पूर्ण रूप से गलत मानी जाती है और तदनुसार खारिज की जाती है।

रघु नाथ केलकर बनाम भारत एवं अन्यू बम्बई उच्च न्यायालय में 2008 की जनहित याचिका का संख्याा 40 निर्णित: 24.03.2009 (माननीय न्याजयाधीश/बैंच: स्वातंत्र कुमार: मुख्य न्यायाधीश एवं डी.वाई चन्द्ररचूड, न्यायाधीश)

लेखापरीक्षा के समय, कार्यक्षेत्र एवं सीमा के सम्बतन्धर में नियंत्रक-महालेखापरीक्षक की शक्तियां

बम्बई उच्च न्यायालय द्वारा निर्णीत इस मामलें में एक व्यापक लेखापरीक्षा करने में नियंत्रक-महालेखापरीक्षक की विफलता के बारे में एक आरोप लगाया गया था। न्याायालय ने नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (कर्त्तव्य, शाक्तियां और सेवा की शर्तें) अधिनियम की धारा, 23 के कार्यक्षेत्र पर विचार किया। न्यायालय ने देखा कि लेखापरीक्षा का समय, कार्यक्षेत्र एवं सीमा वे सभी मामले हैं जो नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के क्षेत्राधिकार में आते हैं तथा यह ऐसा मामला नहीं है जिसे न्यायलय को तय करना चाहिए।

निर्णय का उद्धरण

9.  जहां तक याचिका के याचना खण्ड, (ख) का सम्बीन्ध है, वहाँ नियंत्रक-महालेखापरीक्षक की तरफ से एक शपथपत्र फाइल किया गया जिसमें यह कहा गया है कि बाजार स्थियरीकरण योजना के अन्तकर्गत प्राप्तिा एवं संवितरण को विधिवत रूप से प्राप्ति एवं व्यय बजट में शामिल किया गया है जो संसदीय नियंत्रण का विषय है। वित्त मंत्रालय का लेखा एवं भारत सरकार के विनियोजन लेखा की ‘नियमित अंतराल’ पर नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा लेखापरीक्षा की जाती है। नियंत्रक-महालेखपरीक्षक के (कर्त्तव्य, शाक्ति एवं सेवा की शर्तें) अधिनियम, 1971 की धारा 23 के अन्तरर्गत लेखापरीक्षा का कार्यक्षेत्र एवं सीमा, नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा निर्धारित की जाती है। नियंत्रक-महालेखापरीक्षक संविधान के अनुच्छेद 151 के अन्तर्गत लेखापरीक्षा रिपोर्ट प्रस्तु्त करके अपने निष्क्र्ष संसद को सूचित करता है। भारतीय रिजर्व बैंक ने स्पीष्टर किया है कि बाजार स्थिरीकरण योजना द्वारा नकदी के बंध्यी करण से संग्रहीत निधि भारत की समेकित निधि का हिस्सा बनती है, अत: नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा लेखापरीक्षा की गई मानी जाएगी।

10.  हालांकि, याचिकाकर्त्ता सूचना का अधिकार, अधिनियम के तहत एक प्रश्न- से प्राप्त प्रतिक्रिया के ऊपर विश्वास करता है जिसमें 19 जून 2008 को नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा यह बताया गया है कि 2004 से बाजार स्थिरीकरण योजना के तहत केन्द्र सरकार की उधारियों के सम्बन्ध् में कोई विशिष्ट लेखापरीक्षा नहीं की गई थी न ही उसके तहत उधार ली गई निधि के अमल की कोई विशिष्टं लेखापरीक्षा हुई थी। नियंत्रक-महालेखापरीक्षक ने यह भी स्पकष्ट किया है कि भारतीय रिजर्व बैंक के तुलन-पत्र में मुद्रा तथा स्वर्ण पुनर्मूल्यांनकन खाते के संबंध में कोई लेखापरीक्षा नहीं की गई है क्योंकि सूचना के लिए इस प्रश्नु के उत्तर में भारतीय रिजर्व बैंक के लेखे नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के लेखारीक्षा क्षेत्राधिकार में नहीं आते कि 2004 से बाजार स्थिरीकरण योजना के अन्तर्गत या तो उधारियों अथवा निधियों के अमल के संबंध में कोई विशिष्ट लेखापरीक्षा नही की गई थी हमारे विचार में यह उससे अलग नहीं है जो नियंत्रक-महालेखापरीक्षक की तरफ से फाइल किए गए शपथपत्र में कहा गया है। शपथपत्र प्रकट करता है कि अधिनियम की धारा 23 के अन्तर्गत लेखापरीक्षा का कार्यक्षेत्र एवं सीमा नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा निर्धारित की जाती है तथा वित्त मंत्रालय के लेखाओं के साथ-साथ भारत सरकार के विनियोजन लेखा की लेखापरीक्षा नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा नियमित अंतराल पर की जाती है। लेखापरीक्षा का समय, कार्यक्षेत्र तथा सीमा वे सभी मामले है, जो नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के क्षेत्राधिकार में आते हैं तथा निश्चिभत रूप से यह ऐसा मामला नहीं है जिसे न्या यलय को नियत करना चाहिए। नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा न तो संवैधानिक ओर न ही वैधानिक कर्तव्यों की अवेहलना की गई हैं एवं निस्संदेह यह नियंत्रक-महालेखापरीक्षा को विचार करना है कि क्याव एवं किस सीमा तक एक विशिष्टं लेखापरीक्षा की जानी चाहिए।

नेशनल डेयरी डेवलेपमेन्टअ बोर्ड बनाम भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक दिल्ली उच्च न्यायालय में 1998 की डब्ल यू. पी (सिविल) 4834 निर्णित: 27.01.2010 (माननीय न्यानयाधीश संजीव खन्नाल के समक्ष)

लेखापरीक्षा करने की नियंत्रक-महालेखापरीक्षक की शाक्तियां

दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा निर्णीत इस मामले में, नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (कर्त्तव्यं, शाक्तियां और सेवा की शर्तें) अधिनियम की धारा 14,15 एवं 19 के अन्तवर्गत लेखापरीक्षा करने की नियंत्रक-महालेखापरीक्षक की शाक्तिायों पर विचार किया गया था। याचिकाकर्त्ता ने एनडीडीबी के लेखाओं की लेखापरीक्षा करने के लिए अधिनियम 1971 की धारा 14(2) के अन्तर्गत शाक्तियों के आहवान एवं उपयोग करने के लिए नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के प्राधिकार को चुनौती दी थी, जो इसके अपने अधिनियम अर्थात् एनडीडीबी अधिनियम, 1987 द्वारा अधिशासित है तथा जिसमें किसी अन्य कानून पर एनडीडीबी अधिनियम के अधिभावी प्रभाव का प्रावधान है। न्यायालय ने निम्नेलिखित पूर्वसर्ग निर्धारित किए:

  1. नियंत्रक-महालेखापरीक्षक अधिनियम सामान्यन अधिनियम से अलग एक विशेष अधिनियम है।
  2. धारा 14(1) के अन्तसर्गत लेखापरीक्षा करने की नियंत्रक-महालेखापरीक्षक की शक्ति को निकाय अथवा प्राधिकरण पर लागू किसी कानून के तहत कम, नियमबद्ध अथवा प्रतिबन्धित भी किया जा सकता है।
  3. धारा 14(2) एक स्वातंत्र धारा है जो उपरोक्त् धारा में दर्शाई गई शर्तों के एक बार पूरा हो जाने पर लागू होगी तथा यह तथ्य( कि निकाय अथवा प्राधिकरण धारा 14(1) के तहत लेखापरीक्षा के अधीन नहीं हो सकता अप्रासंगिक है।
  4. धारा 15 यह सुनिश्चिरत करने के लिए कि कोई अनुदान/ऋण संस्वीकृत करते समय उचित उपयुक्त प्रक्रिया का पालन किया गया था, मंजूरीदाता प्राधिकारी के लेखाओं/अभिलेखों की संवीक्षा करने की शाक्ति प्रदान करती है।
  5. धारा 15 एवं धारा 14(2) स्वतंत्र धाराएं हैं एवं तभी संचालित होती हैं जब इनमें दर्शाई गई पूर्व शर्तें पूरी हों। धारा 15 को धारा 14(2) के उल्लंघन के लिए अथवा विलोमत: नहीं पढ़ा जा सकता।
  6. धारा 19 के प्रावधान स्पष्टीकारक प्रवृत्ति के हैं। धारा 19(2) धारा 14(2) के प्रावधानों एवं नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के (कर्त्तव्य, शाक्तियां और सेवा की शर्तें) अधिनियम के अन्या प्रावधानों का उल्लंलघन नहीं करती। धारा19(2) संसद द्वारा बनाए गए कानून, जिसके द्वारा निगमों को स्थापित किया गया है, के तहत उनके लेखाओं की लेखापरीक्षा के लिए नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को दी गई शाक्ति एवं अधिकार की रक्षा करती है। इसका अर्थ है कि नियंत्रक-महालेखापरीक्षक, नियंत्रक-महालेखापरीक्षक अधिनियम की धारा 14(1), 14(2) अथवा 15 के तहत किसी निगम के सम्बन्ध में लेखापरीक्षा कर सकता है, जब संबंधित कानून के अन्ततर्गत वार्षिक वित्तीय लेखापरीक्षा नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा नहीं की जाती है।

अरूण कुमार अग्रवाल बनाम भारत सरकार भारत के सर्वोच्च न्यायालय में 2012 के डब्लचयू. पी. (सिविल) 469 निर्णीत: 09.05.2013 (माननीय न्यायाधीश के. एस. राधाकृष्ण न तथा न्यायाधीश दीपक मिश्रा के समक्ष)

राहत प्रदान करने अथवा कार्यवाही प्रारंभ करने के लिए नियंत्रक-महालेखापरीक्षक की लेखापरीक्षा रिपोर्ट एक आधार के रूप में

इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने विचार किया कि क्या नियंत्रक-महालेखापरीक्षक की लेखापरीक्षा रिपोर्ट को न्यायालय द्वारा राहत प्रदान करने अथवा कार्यवाही प्रारंभ करने के लिए एक आधार के रूप में स्वी्कार किया जा सकता है। न्यायालय ने निर्णय दिया कि नियंत्रक महालेखापरीक्षक की रिपोर्ट हमेशा संसद द्वारा सवीक्षा का विषय होती है एवं यह संसद को निर्णय करना है कि क्याा नियंत्रक-महालेखापरीक्षक की रिपोर्ट प्राप्तै करने के पश्चात इस रिपोर्ट पर टिप्णीमहाल करनी है।

निर्णय का उद्धरण

हमने नियंत्रक-महालेखापरीक्षक की रिपोर्ट, पीएसी की भूमिका तथा सदन में अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया का संदर्भ लिया, केवल यह दर्शाने के लिए कि नियंत्रक-महालेखापरीक्षक की रिपोर्ट हमेशा संसद द्वारा संवीक्षा का विषय है तथा सरकार हमेशा नियंत्रक-महालेखापरीक्षक की रिपोर्ट पर अपना विचार प्रस्तुत कर सकती है।

इस मामले में विचार के लिए मूल प्रश्न है कि, क्याय यह न्याएयालय केवल नियंत्रक-महालेखापरीक्षक की रिपोर्ट पर विश्वारस करके राहत प्रदान कर सकता है। नियंत्रक-महालेखापरीक्षक की रिपोर्ट हमेशा संसदीय बहस का विषय है तथा यह संभव है कि पीएसी नियंत्रक-महालेखापरीक्षा की रिपोर्ट पर मंत्रालय की आपत्ति को स्वीथकार करे अथवा नियंत्रक महालेखापरीक्षक की रिपोर्ट को अस्वीरकार करे। नियंत्रक-महालेखापरीक्षक, निर्विवाद रूप के एक स्व्तंत्र संवैधानिक पदाधिकारी है, तथापि यह संसद को निर्णय करना है कि क्याक रिपोर्ट प्राप्त करने के पश्चात अर्थात पीएसी को नियंत्रक-महालेखपरीक्षक की रिपोर्ट पर अपनी टिप्पण करनी है।

हालांकि, हम कह सकते हैं कि चूंकि रिपोर्ट एक संवैधानिक अधिकारी द्वारा निर्मित हैं, यह आदरणीय है तथा इस प्रकार एक किनारे नहीं की जा सकती, परन्तु उन टिप्पणियों, जो सम्बन्धित मंत्रालयों ने नियंत्रक-महालेखापरीक्षा की रिपोर्ट पर प्रस्तुत की है की जांच करना भी इतना ही महत्व पूर्ण है। मंत्रालय हमेशा बता सकता है, यदि नियंत्रक-महालेखापरीक्षक की रिपोर्ट में कोई गलती है अथवा नियंत्रक-महालेखापरीक्षक ने विभिन्न मुद्दों पर अनुचित रूप से सराहना की है।

श्री एस सुब्रह्मणयम बालाजी बनाम तमिलनाडु सरकार तथा अन्य भारत के सर्वोच्च न्यायालय में 2013 के सिविल अपील 5130 निर्णीत: 25.07.2013 (माननीय न्यायाधीश पी. सदाशिवम तथा न्यायाधीश रंजन गोगोई के समक्ष)

व्यय की जाँच के सबंध में नियंत्रक-महालेखापरीक्षक का कर्त्तव्य

सर्वोच्च‍ न्यायालय द्वारा निर्णीत इस मामले में, याचिकाकर्त्ता ने याचना की कि व्यायों का परिनियोजन करने से पूर्व ही उनकी जाँच करना भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक का कर्त्तव्य है। विभिन्न मुद्दों पर विचार करते समय न्यायालय ने देखा कि वैधानिक नियंत्रण के अतिरिक्त।, संविधान के निर्माताओं ने विधामंडल से अलग एक एजेन्सी के माध्यम से सरकारी लेखाओं तथा व्यय पर एक जांच करना उचित समझा। अनुच्छेद 148 ने भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के रूप में एक संवैधानिक पदाधिकारी सृजित किया। नियंत्रक-महालेखापरीक्षक सराकर द्वारा किए गए सभी व्यय का औचित्य, वैधता तथा मान्यता की जाँच करता है तथा सरकारी लेखाओं पर प्रभावशाली नियंत्रण रखता है।

निर्णय का उद्धरण

भारत का नियंत्रक-महालेखापरीक्षक संविधान के अनुच्छेद 148 के अन्तर्गत नियुक्त किया गया एक संवैधानिक पदाधिकारी है। उसका मुख्य कार्य सरकार, सरकारी निकायों तथा राज्य-चालित निगमों की आय तथा व्यय की लेखापरीक्षा करना है। उसके कर्तव्यों की सीमा को नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के (कर्त्तव्य, शाक्तियां और सेवा की शर्तें) अधिनियम, 1971 में सूचीबद्ध किया गया है। सरकार की कार्यवाही को संविधान, भूमि के कानूनों, विधानमंडल तथा भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा नियंत्रित किया जाता है। नियंत्रक महालेखापरीक्षक सरकार द्वारा किए गए सभी व्यय के औचित्य-, वैधता तथा मान्यता की जांच करता है। नियंत्रक-महालेखापरीक्षक का कार्यालय इन योजनाओं के कार्यानव्यन के बाद ही इन पर किए गए व्यय तथा सरकारी लेखाओं पर प्रभावशाली नियंत्रण रखता है। परिणाम स्वरुप, नियंत्रक-महालेखापरीक्षक का कर्त्तव्य केवल व्यय किए जाने के पश्चात ही शुरू होता है।

भारत सरकार के अनुदेश

फाइल सं. 6(5)-बी (आर)/99 वित्त मंत्रालय आर्थिक मामला विभाग बजट प्रभाग नई दिल्लीग 13 जून, 2006

विषय: भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा निष्पा9दन लेखापरीक्षा

यह स्प्ष्टींकरण मांगा गया है कि क्याि निष्पा्दन लेखापरीक्षा नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के (कर्तव्य , शक्तिपयां और सेवा की शर्तें) अधिनियम, 1971 के तहत नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा लेखापरीक्षा के कार्यक्षेत्र के अंतर्गत आती हैं।

2.सरकार ने मामले पर विचार किया है। कर्तव्यर, शक्ति्यां और सेवा की शर्तें अधिनियम, 1971 की धारा 23 के अंतर्गत भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के पास लेखापरीक्षा के मामले और कार्यक्षेत्र से सबंधित अधिनियम के प्रावधानों को लागू करने के लिए विनियमित करने की शक्तिकयाँ है। इन प्रावधान के अनुपालन में नियंत्रक-महालेखापरीक्षक इस प्रयोजन के लिए बनाए गए दिशा-निर्देशों/सिद्धांतो/विनियमों पर आधारित वित्तीय लेखापरीक्षाओं और अनुपालन लेखापरीक्षाओं के अतिरिक्ते निष्पाधदन लेखापरीक्षाएं आयोजित करता है। संवैधानिक अनिवार्यता के अनुसार नियंत्रक-महालेखापरीक्षक की सभी लेखापरीक्षा रिपोर्ट संसद और राज्यस विधान मंडल जैसा भी मामला हो, के समक्ष प्रस्तु त की जाती हैं।

3.इसलिए यह स्पंष्टभ किया जाता है कि निष्पादन लेखापरीक्षा जो लोक निधियों की प्राप्ति और अनुप्रयोग में मितव्यंयिता, दक्षता तथा प्रभाविता की लेखापरीक्षा से संबंधित है इसे भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा पहले से ही विद्यमान निष्पादन लेखापरीक्षा हेतु बनाए गए दिशा-निर्देशों के अनुसार भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा लेखापरीक्षा के कार्यक्षेत्र के अंदर माना जाता है।

4. सभी मंत्रालयों/विभागों से तदनुसार यह अपेक्षा की जाती है कि वे ऐसी लेखापरीक्षाओं के लिए नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा अपेक्षित सभी दस्ताावेजों को उपलब्धख कराते हुए निष्पादन लेखापरीक्षा सहित लेखापरीक्षाओं के आयोजन में सुविधा प्रदान करें। इस संबंध में वित्त मंत्रालय द्वारा जारी कार्यालय ज्ञापन फा. सं. 1(43)-बी/78 दिनांक 23 सितम्ब र 1978 की और मंत्रालयों का ध्याकन आकर्षित किया जाता है जिसमें कि बिना किसी आंशका के लेखापरीक्षा हेतु कार्यालयी दस्ताञवेज के प्रस्तुातीकरण प्रक्रिया और स्थायी अनुदेशों के अनुसार वर्गीकृत फाइलों की अभिरक्षा और सम्भा‍लने के संबंध में उचित देखभाल को स्प ष्ट‍ किया गया है।

5.नियंत्रक-महालेखापरीक्षक की लेखापरीक्षा कार्यक्षेत्र में आने वाले सभी संबंधित अधीनस्थ कार्यालयों और अन्य संस्थाओं को भी तदनुसार सुझाव दिया जाए।

(पी.आर. देवी प्रसाद)
विशेष कार्य अधिकारी (एफआरबीएम)

सेवा में,

  1. भारत सरकार के सचित (सभी मंत्रालय/विभाग)
  2. राज्यस और संघ राज्यए क्षेत्र सरकारों के मुख्यए सचिव
  3. वित्तीय सलाहकार (सभी मंत्रालय/भारत सरकार के विभाग)
  4. सूचना एवं अभिलेख हेतु प्रतिलिपि
    • कैबिनेट सचिवालय एवं
    • भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक का कार्यालय

टिप्पाणियां


नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के (कर्तव्य , शक्तियां और सेवा की शर्तें) अधिनियम 1971 के अन्तर्गत भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के कर्त्तव्यों और शक्तियों की व्याख्या

प्रस्तावना

भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को कार्यों को मुख्यत: भारत के संविधान के अनुच्छेद 149 से 151 के प्रावधानों से लिया गया है। अनुच्छेद 149 में यह व्यवस्था है कि नियंत्रक-महालेखापरीक्षक संघ के और राज्यों के तथा किसी अन्य‍ प्राधिकारी या निकाय के लेखाओं के सम्बन्ध में ऐसे कर्तव्यों का पालन और ऐसी शाक्तियों का उपयोग करेगा जिन्हें संसद द्वारा बनाई गई विधि द्वारा या उसके अधीन विहित किया जाये और जब तक इस निमित इस प्रकार उपबन्ध नहीं किया जाता है तब तक संघ के और राज्यों के लेखाओं के संबंध में कर्तव्यों का पालन और शक्तियों का प्रयोग करेगा जो इस संविधान के प्रारंभ से ठीक पहले क्रमश: भारत डोमिनियन के और प्रांतों के लेखाओं के संबंध में भारत के महालेखापरीक्षक को प्रदत्त थीं या उसके द्वारा प्राक्ताव्य थी। इन अंतवर्ती उपबन्धों के अधीन नियंत्रक-महालेखापरीक्षक संसद द्वारा नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के (कर्त्तव्य, शक्तियां तथा सेवा की शर्तें) अधिनियम 1971(इसके बाद अधिनियम कहा जाएगा) अधिनियमित किये जाने तक संघ के और राज्यों के लेखाओं के संबंध में उन कर्त्तव्यों का पालन और उन शक्तियों का उपयोग करते रहे हैं जो भारत (अनन्तिम संविधान) आदेश, 1947 द्वारा यथानुकूलित भारत सरकार (लेखा एवं लेखापरीक्षा) आदेश 1936 द्वारा उपबन्धिंत की गई थी। अधिनियम जो 15 दिसम्बखर 1971 को प्रवृत्त हुआ, 1976,1984,1987 और 1994 में संशोधित किया गया। अधिनियम संविधान के अनुच्छेतद 148(3) और 149 के अंतर्गत बनाया गया एक व्यापक विधान है। यह (क) नियंत्रक-महालेखापरीक्षक का वेतन और सेवा की अन्य शर्तें (ख) संघ, राज्यों, संघ राज्य क्षेत्रों और अन्य प्राधिकरणों तथा निकायों के लेखाओं की लेखापरीक्षा एवं लेखाओं के संबंध में उसके कर्तव्य और शक्तियों को वर्णित करता है। राज्य विधामंडल का कोई भी नियम नियंत्रक-महालेखापरीक्षक अथवा इसके प्रतिनिधियों को किसी कर्त्तव्य या शक्तियों के निर्वहन से नहीं रोक सकता। इसी प्रकार संसद द्वारा बनाए गए किसी कानून द्वारा निर्धारित नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के कर्त्तव्यों एवं शक्तियों को राज्यं विधान मंडल द्वारा बनाए गए किसी कानून के अधीन संकुचित या अधिक्रमित नहीं किया जा सकता।

लेखाओं के संबंध में नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के कर्त्तव्य और उत्तरदायित्व

अधिनियम की धारा 10 से 12 संघ और राज्यों और विधान मण्डल वाले संघ राज्यो क्षेत्रों के लेखाओं के संकलन के संबंध में नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के उत्तरदयित्व से संबंधित है।

धारा 10(1) का पहला परन्तुक राष्ट्रपति को नियंत्रक-महालेखापरीक्षक से परामर्श करने के बाद उसे आदेश द्वारा निम्नलिखित के संकलन के उत्तरदायित्व से मुक्त करने का प्राधिकार देता है। (i) संघ के लेखों को (या तो तुरन्त‍ या अनेक आदेश जारी करके शनै: शनै), (ii) संघ की किसी विशिष्ट( सेवा या विभाग के लेखे।

धारा 10(1) का दूसरा परन्तुक राज्य के राज्‍यपाल को राष्ट्रपति के पूर्व अनुमोदन और नियंत्रक-महालेखापरीक्षक से परामर्श के बाद आदेश द्वारा निम्नलिखित के संकलन के उत्तरदायित्व- से मुक्त करने का प्राधिकार देता है। (i) राज्य के लेखे (या जो तुरन्त या अनेक आदेश जारी करके शनै शनै) और (ii) राज्य की किसी विशिष्ट सेवा या विभाग के लेखे। राष्ट्रपति भी नियंत्रक-महालेखापरीक्षक से परामर्श करने के बाद आदेश द्वारा उसे किसी विशिष्ट वर्ग या प्रकृति के लेखाओ को रखने के उत्तदायित्व से मुक्त कर सकता है।

1976 में, अधिनियम की धारा 10(1) के पहले परन्तु्क के अधीन शक्ति‍यों के उपयोग में नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को (क) जागीर, जमीन आदि के पुनर्ग्रहण के बदले पेंशन (ख) भारतीय लेखा तथा लेखापरीक्षा विभाग से संबंधित लेखाओं के अलावा संघ सरकार के विभिन्न विभागों/मंत्रालयों के लेखाओं के संकलन और रखरखाव के उत्तरदयित्व से मुक्त कर दिया गया है। इसी प्रकार, नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को चंडीगढ़, दादरा नगर हवेली और लक्षद्वीप संघ शासित प्रदेश को छोड़कर संघ शासित प्रदेशों के लेखाओं को संकलित करने की जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया गया। जहां तक राज्यों का संबंध हैं, वहां नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (क) गोवा राज्य को छोड़कर सभी राज्यों के लेखाओं का संकलन (ख) आवश्यीतानुसार राज्यों के लेखाओं के संकलन के संबंध में ऐसे लेखाओं को रखना और (ग) उनके विनियोग लेखाओं और वित्त लेखाओं को तैयार करते हैं।

धारा 10 की उप-धारा (i) का तीसरा परन्तुक राष्ट्रपति को किसी विशिष्ट वर्ग और प्रकृति के लेखाओ के रखने के उत्तरदायित्व से नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को मुक्त करने का प्राधिकार देता है। इन उपबन्धों के अनुपालन में, राष्ट्रपति ने अनेक आदेश जारी करके राजस्थान, मिजोरम, अरूणाचल प्रदेश, जम्मू व कश्मीर, बिहार (अब झारखण्ड सहित) पंजाब और सिक्किम के राज्यों में राज्य सरकार के सभी कर्मचारियों के भविष्य निधि लेखाओं के रख-रखाव के उत्तरदायित्व से नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को मुक्त कर दिया है। नियत्रंक-महालेखापरीक्षक से संघ सरकार के विभिन्न् विभागों/मंत्रालयों के लेखाओं के संकलन के उत्तरदायित्व के अंतरण की योजना के अंग के रूप में उसे भारतीय लेखा तथा लेखापरीक्षा विभाग को छोड़कर संघ सरकार के सभी कर्मचारियों के भविष्य निधि लेखाओं के रख-रखाव के उत्तरदायित्व़ से मुक्त कर दिया गया है।

धारा 11 राष्ट्रपति को संघ या जिस संघ राज्य क्षेत्र में विधान सभा हो के प्रयोजन के लिए वार्षिक प्राप्ति्यों और संवितरण (वित्त लेखा) से संबंधित लेखाओं को तैयार और प्रस्तुत करने के उत्तरदयित्व से नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को उसके परामर्श करने के बाद मुक्त करने का प्राधिकार है। यह राज्य के राज्यपाल को राष्ट्रपति के पूर्व अनुमोदन से और नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के परामर्श के बाद राज्य के प्रयोजन के लिए वार्षिक प्राप्तियों और संवितरणों से संबंधित लेखाओं को तैयार करने और प्रस्तु्त करने के उत्तरदायित्व से नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को मुक्त करने का प्राधिकार देती है। राष्ट्रपति ने 20 जून 1978 को आदेश जारी किया था। इस आदेश में उन्होंने नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को 1977-78 के आगे से संघ सरकार के वित्त लेखे तैयार करने के उत्तरदायित्व से मुक्त किया है। नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को 1988-99 के आगे से लेखाओं से संघ राज्य क्षेत्र पांडिचेरी के प्रयोजन के लिए वार्षिक प्राप्तियों और संवितरणों को संबंधित शीर्ष के अधीन दर्शाते हुए प्रत्ये्क वर्ष लेखे तैयार करने के उत्तदायित्व 9 से 10 अप्रैल, 1989 को राष्ट्रपति द्वारा जारी आदेश के द्वारा भी मुक्त कर दिया गया है। उसे वर्ष 1988-89 के आगे से गोवा राज्य के प्रयोजन के लिए वार्षिक प्राप्तियों और संवितरणों को संबंधित शीर्षों के अधीन दर्शाते हुऐ लेखाओं को प्रत्येक वर्ष तैयार करने के उत्तरदायित्वो से 27.06.89 को राष्ट्रपति के पूर्व अनुमोदन से गोवा के राज्यपाल द्वारा जारी आदेश द्वारा मुक्त कर दिया गया है। इस तथ्य् पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि उपरोक्त मामलों में नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को वित्त लेखाओं (संघ) को तैयार करने के उत्तरदयित्व् से मुक्त कर दिया गया है परन्तु वह उसे संसद/राज्य /संघ राज्य क्षेत्र विधान मंडल के समक्ष प्रस्तुत करने के लिए राष्ट्रपति/राज्यपाल/प्रशासक को इसके प्रस्तुत करने के लिए उत्तरदायी है। राज्ये के वित्त लेखाओं को तैयार करने के उत्तरदायित्व से नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को मुक्त करने के लिये राष्ट्रपति का पूर्व अनुमोदन और नियंत्रक-महालेखापरीक्षक से परामर्श आवश्यक है।

अधिनियम की धारा 12 नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को वित्तीय विवरण बनाने में संघ सरकार, राज्य सरकारों और संघ शासित प्रदेशों को जहां विधान सभा है सूचना देने एवं सहायता प्रदान करने के उत्तदरदायित्व से संबंधित है।

लेखापरीक्षा के संबंध में कर्त्तव्य

अधिनियम की धारा 13 से 21, 23 और 24 में लेखापरीक्षा से संबंधित सामान्यत प्रावधान निहित हैं। अधिनियम की धारा 13 नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को यह व्यादिष्ट् करती है कि वह प्रत्येक राज्य की और प्रत्येक ऐसे संघ राज्य् क्षेत्र की, जिसमें विधान सभा हो भारत की संचित निधि में से किये गये व्य‍य की लेखापरीक्षा करने और यह अभिनिश्चित करने संबंधित कार्य को निर्धारित किया गया है कि लेखाओं में संवितरित दिखाया गया धन विधिक रूप से उस सेवा या प्रयोजन के लिए जिसके लिये यह लागू या प्रभारित किया गया और क्या व्यय उसे नियंत्रित करने वाले प्राधिकारी के अनुरूप है। व्यय की लेखापरीक्षा व्याापक है जिसमें निम्न्लिखित शामिल है;

  1. निधियों के प्रावधान के अनुसार लेखापरीक्षा;
  2. नियमितता लेखापरीक्षा;
  3. औचित्य लेखापरीक्षा;
  4. दक्षता-सह-निष्पादन लेखापरीक्षा और
  5. प्रणाली लेखापरीक्षा

लेखापरीक्षा की पूर्णता और यथार्थता की जांच की जाती है तथा यह देखा जाता है कि वहां उचित वाउचर और भुगतान के साक्ष्य है। निधियों के प्रावधान के अनुसार लेखापरीक्षा का उद्देश्य यह अभिनिश्चित करना है कि क्या लेखाओं में संवितरित दिखाया गया धन विधिक रूप से उस सेवा या प्रयोजन के लिए, जिसके लिए वह किया गया या प्रभारित किया गया, उपलब्ध या उपयुक्त था। संघ सरकार और ऐसे राज्य सरकारों तथा संघ शासित क्षेत्र की सरकारें, जिनके लेखे संबंधित सरकारों द्वारा संकलित किए जाते हैं तथा रखे जाते हैं, के विनियोग लेखे संबंधित सरकारों द्वारा तैयार किये जाते है तथा नियंत्रक-महालेखापरीक्षक उनकी लेखापरीक्षा करते है। अन्य राज्य सरकारों के विनियोग लेखे नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा संकलित और रखे गये लेखाओ से उनके द्वारा तैयार किए जाते हैं। लेखापरीक्षा में यह देखा गया है कि व्यय नियंत्रित करने वाले प्राधिकार के अनुरूप है (नियमितता लेखापरीक्षा)। लेखापरीक्षा के दौरान कार्यकारी की कार्यवाही के औचित्य की भी जांच की जाती है। और व्यय की औपचारिकता से अलग उसके बुद्धिमता स्वामी भक्ति और मित्तव्यतयिता को देखता है और फिजूल खर्च हानि, अपव्यय और निरर्थक व्यय के मामले विधान मंडल के ध्यान में लाता है और इस प्रकार विवेक के किसी अनुचित प्रयोग को चुनौती देता है और व्यय के औचित्य पर टिप्‍प्‍णी करता है (औचित्यि लेखापरीक्षा)। दक्षता-सह-निष्पा्दन लेखापरीक्षा विकास शील कार्यकमों के निष्पाादन की प्रगति और दक्षता का व्यापक मूल्यांकन है। इस लेखापरीक्षा में, यह मूल्यांकित और निर्धारित करने का प्रयत्‍न किया जाता है कि इस स्तर पर प्राप्त किये जाने वाले सामाजिक और आर्थिक लक्ष्यों को प्राप्त किया गया था और उनकी लागत क्या थी और इसकी जांच की एजेंसी या विभाग अपनी वित्तीय जिम्मे्दारियों को पूर्ण रूप से कैसे कर रहा है और यह अभिनिश्चित करना कि योजना को कार्यान्वित किया जा रहा हैं और उनके कार्यों को मितव्ययी ढंग से किया जा रहा है। प्रणाली लेखापरीक्षा में, प्राधिकरण अभिलेखन, लेखाकरण और आंतरिक नियंत्रण को विनिमित करने वाली संगठन और प्रणाली का विश्लेषण किया जाता है और गुणों के मानक तथा निष्पानदन का मूल्यांकन किया जाता है।

अधिनियम की धारा 13 के अनुसार नियंत्रक-महालेखापरीक्षक से यह अपेक्षा की जाती है कि वे संघ के, राज्यों के और संघ शासित क्षेत्र जहां विधान सभा है की आकस्मिक निधि और लोक लेखा संबंधित सभी लेन देनों की लेखापरीक्षा करे और संघ के या राज्य या संघ राज्य क्षेत्र के किसी विभाग में रखे गये सभी व्यापार विनिर्माण लाभ और हानि लेखाओं और तुलन पत्र और अन्य सहायक लेखाओं की लेखापरीक्षा करें।

धारा 13 नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को उसके द्वारा लेखापरीक्षित व्यय, लेन-देनों या खातों पर रिपोर्ट देन का भी कर्त्तव्य प्रदान करती है।

सरकार द्वारा वित्तपोषित निकायों और प्राधिकरणों की लेखापरीक्षा के संबंध में कर्त्तव्य और जिम्मेदारियाँ

सरकार द्वारा संचित निधि में से किया गया व्यय प्राय: विभिन्नि निकायों और प्राधिकारणों को अनुदान और ऋुण के रूप में दिया जाता है। अधिनियम की धारा 13 के अधीन, नियंत्रक-महालेखापरीक्षक की यह जिम्मेदारी है कि वह ऐसे व्यय की लेखापरीक्षा करें। ऐसे व्यय की यह लेखापरीक्षा सरकारी कार्यालयों में उपलब्ध अभिलेखों से की जाती है और अनुदान तथा ऋण की स्वीकार्यता और संस्वीकृति तथा अनुदान तथा कर्ज की शर्तों की पूरा करने के सत्यापन और जिस प्रयोजन के लिए दिये जाते है उनके उपयोग की जांच करने का भी निर्देश दिया गया है। अधिनियम के प्रवर्तन से पूर्व निकाय और प्राधिकरण के अभिलेख अधिकार स्वरूप उपलब्ध नहीं थे और इसी अनुदान और कर्ज के भुगतान के लिए शर्त के रूप में सरकार द्वारा संस्वीकृति के आदेशों में प्रावधान के रूप में सुरक्षित थी।

अधिनियम की धारा 14 और 15 में भारत सरकार या राज्य अथवा संघ राज्य क्षेत्र से अनुदान या/और कर्ज के रूप में वित्त सहायता प्राप्त करने वाले प्राधिकरणों और निकायों के लेखाओं की लेखापरीक्षा के संबंध में प्रावधान किये गये हैं। अधिनियम की धारा 14 संघ और राज्य राजस्व से पर्याप्त रूप को वित्तपोषित निकार्यों और प्राधिकरणों की प्राप्तियों और व्यय की लेखापरीक्षा से संबंधित है। अधिनियम की धारा 15 किसी विशिष्ट उद्देश्य के लिए संस्थाक से बाहर विभागों और एजेंसियों को अनुदान या ऋण प्रदान करने की प्रक्रिया की संवीक्षा इस बात को ध्यान में रखकर करती है कि कितने विभाग/एजेंसियों स्वयं को संतुष्ट कर पायेगें कि अनुदान या ऋण जिन शर्तों पर दिया था वे पूरी हुई हैं या नही। अनुदानों या ऋणों के रूप वित्तीय सहायता प्राप्तक करने वाले प्रधिकरण या निकायों के लेखाओं की लेखापरीक्षा के लिए धारा 14 से 15 में प्रावधान इन कई धाराओं में विशिष्ट निश्चित शर्तों और मानदंडों से संबंधित हैं।

धारा 14(I) के अधीन लेखापरीक्षा करवाने के लिए किसी संस्था के लिए आवश्यक अवयव है:-

  1. अनुदान और/या ऋण किसी निकाय या प्राधिकरण को दिया जाना चाहिए।
  2. अनुदान या ऋण समेकित निधि में से अदा किया जाना चाहिए
  3. स्वाायत्त निकाय को धारा में दिए गए निबंधन के अनुसार अनुदान या ऋण द्वारा ‘‘वास्ततव में वित्तपोषित’’ होने चाहिए।
  4. निकाय या प्राधिकरण की सभी प्राप्तियों और व्यय की लेखापरीक्षा होगी।
  5. लेखापरीक्षा निकाय या प्राधिकरण पर लागू समय अनुसार किसी विधि के प्रावधनों के अध्यधीन होगी। उक्त परिच्छेद का यह अर्थ है कि हमारी लेखापरीक्षा, लेखापरीक्षा प्रबंधनों के साथ सहवर्ती होगी और सहायक होगी जिसे कानून में उल्लिाखित किया जा सकता है।
  6. संविधान के अनुच्छेद 149 में उपयोग किए गए शब्द ‘‘निकाय’’ और ‘‘प्राधिकरण’’ न तो संविधान में और न ही अधिनियम में परिभाषित किए गए हैं, जिसमें इन शब्दों का भी उपयोग किया गया है। तथापि भारत के महान्यायवादी द्वारा ‘‘अधिकारी’’ शब्द को समझाया गया है, जिसका अर्थ है कि संविधान में संसद या राज्य विधान सभा द्वारा पारित अधिनियमों में प्रावधानों के आधार पर निहित शक्ति या आदेश का उपयोग करने वाला कोई व्यक्ति या निकाय । उनके द्वारा ‘‘निकाय’’ का बताया गया अर्थ है व्यक्तियो का एक समूह या तो निगमित अथवा अनिगमित इसलिए ‘‘निकाय’’ की अभिव्यक्ति में विशिष्ट विधियों के अंतर्गत स्वायत्त संगठनों के रूप में संस्थापित संस्थाए या संगठन या सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम 1860 या भारतीय न्यास अधिनियम 1882 के अंतर्गत पंजीकृत सोसाइटी के रूप में या अन्य विधियां स्वौयच्छिक संगठन या गैर-सरकारी संगठन शहरी और ग्रमीण स्थानीय स्वशासन संस्थांए, सहकारी सोसाइटी, सोसाइटी या क्‍लब आदि शामिल होगें।
  7. ‘‘निकाय’’ और ‘‘प्राधिकरण’’ शब्द मे कंपनी या निगम शामिल हैं। इस प्रकार यदि कोई कम्पनी या निगम अधिनियम की धारा 19(1), 19(2) या 19(3) के अंतर्गत नहीं आती तो, धारा 14(1), 14(2) या 20(2) के अंतर्गत इनकी लेखापरीक्षा की जा सकती है, जैसा भी मामलों हो, प्रत्येक धारा में विनिर्दिष्ट, शर्तों को पूरा किया जा रहा है। धारा 14 में दूसरी शर्त हैं कि अनुदान और/या कर्ज संचित निधि से अदा हाने चाहिए। जब तब यह स्पष्ट न हो जाये कि मध्यनस्थ/ निकाय अथवा प्राधिकरण सरकार द्वारा प्रदत्त अनुदान/कर्ज को दने के लिए केवल एक एजेन्सी थी तब तक ऐसे मामलों को धारा 14 के अधीन लेखापरीक्षा के प्रयोजन के लिए अलग किया जाना चाहिए जिसमें अनुदान या कर्ज किसी निकाय या प्रधिकरण द्वारा अन्यप निकाय या प्राधिकरण के माध्यम से प्राप्त होते हैं जो स्वय केन्द्र या राज्य सरकार द्वारा वित्तपोषित हैं।

केन्द्रीय सरकार, राज्य सरकारों और विधान मंडल वाले संघ राज्य क्षेत्र की सरकारों के कर और शुल्क कभी-कभी स्थानीय निकायों के पूर्णत: या अंशत: समनुदेशित और अंतरित किये जाते है। यह निर्णय किया गया कि यदि यह राशि स्थानीय निकायों को विशिष्‍ट प्रयोजन के लिए अदेय राशि का भुगतान करके उनके व्यय को वित्तपोषण के रूप में दी गई है तो स्थामनीय निकायों को किये गये करों के इस हस्तान्तरण को अधिनियम की धारा 14 के अनुसार अनुप्रयोग के प्रयोजन के लिए अनुदान के रूप में माना जा सकता है। इस समय स्थानीय निकायों को कोई हानियों, क्षतियों आदि की पूर्ति के लिए अदा की गई क्षतिपूरक राशि इस प्रयोजन के रूप नहीं माना जानी चाहिए।

इस धारा की तीसरी शर्त को उप धारा के नीचे दिये गए ‘‘स्पतष्टीकरण’’ के साथ पढ़ा जाए। भारत की या किसी राज्या अथवा विधानसभा वाले किसी संघ राज्य क्षेत्र की है, की समेकित निधि से पिछले वित्तीय वर्ष से किसी निकाय या प्राधिकरण को दिये गये अनुदान या ऋण या दानों की राशि को पूर्ववर्ती वित्तीय वर्ष से अग्रेनीत उस निकाय या प्राधिकरण को दिये गये अनुदान या कर्ज की अप्रयुक्त राशि समूहिक रूप से एक वर्ष में ` 25 लाख से कम न हो (1984 में संशोधन से पूर्व यह सीमा ` 5 लाख थी) यदि किसी निकाय या प्राधिकरण के कुल व्यनय के पचहत्तर प्रतिशत से कम की वित्तीय सहायता के संबंध अन्य प्रावधान भी पूरे होते है तो निकाय या प्राधिकरण को इस धारा के अंतर्गत शामिल किया जाएगा। कर्जों के मामले में यह बात ध्यान रखी जाए कि केवल ‘‘अप्रयुक्त’’ पर विचार किया जाना चाहिए न कि निकाय प्राधिकरण के सम्पूतर्ण बकाया ऋण पर। जब निकाय या प्राधिकरण का लेखा वर्ष (उदाहरणत: सहकारी समितियां) के वित्तीय वर्ष के समरूप नहीं है तो यह अवधारण करने के संबंध में कि क्याा निकाय या प्राधिकरण धारा 14 के अंतर्गत आते हैं, जांच विशेष निकाय या प्राधिकरण की सामान्य लेखा अवधि के संदर्भ में की जाती है।

धारा 14 के अंतर्गत लेखापरीक्षा के लिए चौथी शर्त है कि लेखापरीक्षा केवल अनुदान या ऋण और उसके उपयोग तक ही सीमित नहीं है परन्तु निकाय या प्राधिकरण को किसी भी स्रोत से प्राप्त सभी प्राप्तियों और व्यय को भी इस प्रयोजन के लिए शामिल किया गया है। की जाने वाली लेखापरीक्षा का प्रकार कार्यक्षेत्र प्रकृति और आवधिकता पूर्णत: अधिनियम की धारा 23 के अन्तर्गत नियंत्रक महालेखापरीक्षक के विवेक पर है। 1984 के अधिनियम के संशोधन के साथ धारा 14 की उपधारा (2) वित्तीय वर्ष में एक करोड़ से कम नहीं है। जहाँ संचित निधि से ऐसे निकाय या प्राधिकरण के लिए अनुदान और या ऋण तो वहाँ किसी निकाय या प्राधिकरण की सभी प्राप्तियों और व्यय की लेखापरीक्षा करने के लिए राष्ट्रपति/किसी राज्य के राज्यपाल/विधान सभा वाले संघ राज्य) क्षेत्र के प्रशासक के पूर्व अनुमोदन से नियंत्रक-महालेखापरीक्ष द्वारा किए जाने के संबंध में समर्थ्यकारी उपबन्धक बनाए गए है। संशोधन द्वारा किया गया दूसरा परिवर्तन यह है कि धारा 14(3) के अधीन, नियंत्रक महालेखापरीक्ष उप धारा (1) या उपधारा (2) की शर्तों को किन्हीर दो अनुवर्ती वर्षों के दौरान पूरा न किये जाने के बावजूद भी आगे के दो वर्ष की अवधि के लिए किसी निकाय या प्राधिकरण की प्राप्तिियों और व्यीय की लेखापरीक्षा जारी रखेगा।

अधिनियम की धारा 15 में किन्ही प्राधिकरणों और निकायों को विशिष्ट प्रयोजनों के लिए दिये गये अनुदान या कर्ज के मामले में नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के कार्यों का उल्लेख किया गया है। इस धारा के दो भाग है। प्रथम भाग में नियंत्रक-महालेखापरीक्षक की सांविधिक जिम्मेदारी का उल्लेख है ताकि वे उस कार्य विधि की संवीक्षा कर सके जिसके द्वारा भारत या किसी राज्य या किसी संघ राज्य क्षेत्र की संचित निधि से किसी प्राधिकरण या निकाय जो विदेशी राज्य या अन्तनराष्ट्रीय संगठन नहीं है को किसी विशिष्टि प्रयोजन के लिये अनुदान या कर्ज संस्वीकृती दाता प्राधिकारी उन शर्तों को पूरा करते हैं जिनके अध्य्धीन इस प्रकार के अनुदान या कर्ज दिए गए है।

दूसरा भाग उसे निम्नोवत कुछ प्रतिबंधों के अध्यतधीन ऐसे अनुदान और कर्ज को प्राप्त करने वाले प्रधिकरण या निकाय की बहियों और लेखाओं की जांच का अधिकार देता हैं नामत:-

  1. प्राधिकरण या निकाय एक विदेशी राज्य या अन्तनराष्ट्रीय संगठन नहीं हैं;
  2. यदि संबंधित राष्ट्रपति/राज्यपाल/प्रशासक के विचार में नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को उनके परामर्श से किसी निकाय या प्राधिकरण की कार्यविधियों को उक्त संवीक्षा करने से मुक्त करना लोक हित में आवश्यक हो ता वह उन्हें आदेश द्वारा मुक्त कर सकता है;
  3. किसी निगम की बहियों ओर लेखाओं की जांच का अधिकार जहां इसको स्थापित करने वाली विधि (उस विधि के अधीन बनाये गये निगम और विनियम) में व्यवस्था है (जिसमें सरकार द्वारा नियुक्त या उस विधि द्वारा प्रदत्त शक्ति के अन्त्र्गत ऐसे प्राधिकारी द्वारा) जिनकी लेखापरीक्षा नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के इतर एजेन्सी द्वारा की जाती है। वहां यह केवल संबंधित राष्ट्रपति/राज्यपाल/प्रशासक के प्राधिकार से की जाएगी। ऐसा प्राधिकार नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के पूर्व परामर्श के बाद और ऐसे प्रस्ताव के संबंध में संबंधित निगम को अभिवेदन करने का उपयुक्त अवसर देने के बाद किया जाता है।

धारा 15 के प्रावधानों से यह देखा जायेगा कि जहां अपनाई गयी कार्यविधि की जांच करने के प्रयोजन के लिए संस्वीकृत दाता प्राधिकारियों के रिकार्डों की जांच अनिवार्य या सांविधिक कार्य है वहां यह अनिवार्य नहीं है कि सभी प्राधिकरणों और निकायों की बहियां, जिनकी लेखा और बाहियां लेखापरीक्षा विभाग द्वारा लेखापरीक्षा के लिए खोली जाती है, की आवश्यक रूप से संवीक्षा की जाए। इसके अतिरिक्त, इस धारा के अधीन की जाने वाली जाँच विशिष्ट प्रयोजनों के लिए दिय गए अनुदान या कर्ज से संबंधित है परन्तु बिना किसी शर्त के सामान्य प्रयोजन के लिए दिए गए अनुदान या कर्ज इसके अन्तर्गत नही आते है। भूमि, भवन, उपस्कर आदि जैसे विशिष्ट मदों या रखरखाव, खरीद/वसूली के लिए दिए गए अनुदान/कर्ज को ऐसे अनुदान/कर्ज को जो कुछ शर्तो के आध्यधीन दिए जाते है, घाटे आदि को पूरा करने के लिए दिए गए अनुदान/कर्ज विशिष्ट प्रयोजन के लिए दिया गया अनुदान/कर्ज माना जाना चाहिए।

यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि धारा 14(1) की धारा 15 में कर्ज/अनुदान की लेखापरीक्षा के परिणामों को विशेषरूप से उल्लिखित करने की व्यवस्था नही है। तथापि, अनुदान/ऋण समेकित निधि से व्यय होता है इसलिए सूचना देना अधिनियम की धारा 13 के उपबंधों के अधीन अविवेचित है।

प्राप्तियों की लेखापरीक्षा के संबंध में कर्तव्या और जिम्मेदारियां

अधिनियम की धारा 16 भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को भारत, प्रत्येप राज्य और विधान सभा वाले प्रत्येक संघ राज्य क्षेत्र की समेकित निधि में प्रदत्त प्राप्तियों की लेखापरीक्षा का प्रावधान प्रदान करती है। इसके द्वारा यह भी अपेक्षित है कि वह इस बात की संतुष्टि कर लें कि इसकी तरफ से नियम और प्रक्रियाएं राजस्व के आकलन, संग्रहण और समुचित आवंटन पर प्रभावी नियंत्रण को बनाये रखने के लिए अभिकल्पित हैं और उनको विधिवत रूप से देखा जा रहा है और इस उद्देश्य के लिए ऐसे लेखे की ऐसी जांच करनी है जैसा वह उचित समझे और उस पर रिपोर्ट करे। नियंत्रक-महालेखापरीक्षक अधिनियम के अधिनियमन से पूर्व ही, प्राप्तियों की लेखापरीक्षा सहमति के आधार पर महालेखापरीक्षक को सौंपी गई थी। भारत सरकार (लेखापरीक्षा और लेखा) आदेश 1936 के पैरा 13(2) के अनुसार, महालेखापरीक्षक किसी प्रांत के गवर्नर जनरल या राज्यपाल के अनुमोदन और अनुरोध पर सरकार की प्राप्तियों की लेखापरीक्षा कर सकेगा।

भंडार और स्टॉक के लेखाओं की लेखापरीक्षा के संबंध में कर्तव्य और जिम्मेदारियां

अधिनियम की धारा 17 नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को संघ या किसी राज्य या किसी संघ राज्य क्षेत्र के किसी कार्यालय या विभाग में रखे गए स्टोर और स्टॉ्क के लेखाओं की लेखापरीक्षा करने और रिपोर्ट प्रस्तुत करने का प्राधिकार प्रदान करती है।

सरकारी कम्पनियों की लेखापरीक्षा के संबंध में कर्तव्य और जिम्मेदारियां

अधिनियम की धारा 19 की उप धारा 1 में व्यिवस्थां है कि सरकारी कम्पनियों के लेखाओं की लेखापरीक्षा के संबंध में नियंत्रक-महालेखापरीक्षक अपने कर्तव्यों और शक्तियों का कम्पपनी अधिनियम, 1956 के प्रावधानो के अनुसार निष्पादन और उपयोग किया जाएगा।

इस संबंध में कम्पनी अधिनियम, 1956 के सुसंगत प्रावधान उसकी धारा 617 और 619 (अनुबंध-।) में समाविष्ट है।

कम्पनी अधिनियम, 1956 का स्थान कम्पनी अधिनियम 2013 ने ले लिया है। इस संबंध में कम्पनी अधिनियम 2013 के संगत प्रावधान धारा 2(45), 139, 143, 394 और 395 (संदर्भ अनुबंध-।।) में दिए गए हैं।

धारा 2(45) एक सरकारी कम्पनी को एक कम्पनी जिसमें अदा की गई शेयर पूंजी के 51 प्रतिशत से कम नहीं, केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार या सरकारों द्वारा या आंशिक रूप से केन्द्रीय सरकार द्वारा और आंशिक रूप से एक या अधिक राज्य सरकारों द्वारा रखी जाती है और एक ऐसी कम्पनी को शामिल करता है जो ऐसी ही किसी सरकारी कम्पनी की एक सहायक कम्पनी है, के रूप में परिभाषित करती है।

कम्पपनी अधिनियम 2013 की धारा 139 और 143 के अंतर्गत:

  1. सरकारी कम्पनी या अन्य किसी कम्पनी जिसका स्वामित्व केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार या सरकारों, या आंशिक रूप से केन्द्रीय सरकार और आंशिक रूप से एक या अधिक राज्य सरकारों द्वारा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से नियंत्रित हो, के लेखापरीक्षक को नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा नियुक्त किया जाएगा।
  2. नियंत्रक-महालेखापरीक्षक निर्देश देंगे कि सरकारी कम्पनी के लेखाओं की लेखापरीक्षा किस ढंग से की जानी अपेक्षित है।
  3. लेखापरीक्षा नियंत्रक- महालेखापरीक्षक को लेखापरीक्षा रिपोर्ट की एक प्रति प्रस्तु्त करेगा जिसमें नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा जारी निर्देश, यदि कोई है, की गई कार्यवाही और कम्पनी के लेखाओं और वित्तीय विवरणों पर इसके प्रभाव शामिल होंगे।
  4. नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के पास ऐसे किसी व्यक्ति या व्यक्तियों, सें जो नियंत्रक-महालेखापरीक्षक की तरफ से प्राधिकृत है, द्वारा कम्परनी के वित्ती य विवरणों की पूरक लेखापरीक्षा करने का अधिकार है और ऐसी लेखापरीक्षा के उद्देश्यों के लिए ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों द्वारा ऐसे मामलों पर प्राधिकृत व्यक्ति या व्यक्तियों के समक्ष सूचना या अतिरिक्त सूचना प्रस्तुक करना अपेक्षित है और ऐसे प्रपत्र में जैसा कि नियंत्रक-महालेखापरीक्षक निदेश दे सकता है, और उस पर टिप्पणी कर सकता है या ऐसी लेखापरीक्षा रिपोर्ट का पूरक हो सकता है, तो कम्पनी द्वारा लेखापरीक्षित वित्तीय विवरणों की प्रतियां प्रत्येक अधिकृत व्यक्ति को भेजी जाएंगी और कम्पनी की वार्षिक सामान्य बैठक में भी प्रस्तुत की जाएंगी।
  5. धारा 139(5) या 139(7) के अन्तर्गत आने वाली किसी कम्पनी के मामले में, यदि आवश्यक समझो तो नियंत्रक-महालेखापरीक्षक एक आदेश द्वारा की गई ऐसी कम्पनी के लेखाओं की लेखापरीक्षा की नमूना जांच करा सकता है और नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (कर्तव्य, शक्ति्यों और सेवा की शर्ते) के अधिनियम, 1971 की धारा 19ए के प्रावधान ऐसी नमूना लेखापरीक्षा की रिपोर्ट पर लागू होंगे।

कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 394 और 395 के अन्तर्गत

  1. जहां केन्द्र सरकार किसी सरकारी कम्पनी की सदस्य है, केन्द्र सरकार उस कम्पनी की कार्य प्रणाली और मामलों पर एक वार्षिक रिपोर्ट मांगेगी जिसकी (क) नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा दी गई टिप्प्णियों से पूर्व अपनी वार्षिक सामान्य; बैठक से तीन महीनों के अन्दर ही तैयार की गई और लेखापरीक्षा रिपोर्ट धारा 143(6) के परन्तुक के अन्तर्गत प्रस्तुत की जाएगी, और (ख) जैसे ही ऐसी तैयारी के बाद, लेखापरीक्षा की एक प्रति के साथ संसद के दोनो सदनों के समक्ष प्रस्तुत की जा सकती है और नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा तैयार की गई लेखापरीक्षा रिपोर्ट पर टिप्पणी कर सकते है या पूरक कर सकते है;
  2. जहां केन्द्र सरकार के अतिरिक्त कोई भी राज्य सरकार, किसी सरकारी कम्पनी की सदस्य है, तो वह राज्य सरकार धारा 394(1) के अन्तर्गत तैयार की गई वार्षिक रिपोर्ट की एक प्रति की मांग करेगी। लेखापरीक्षा रिपोर्ट की एक प्रति के साथ धारा 394(1) में संदर्भित लेखापरीक्षा पर टिप्पणियॉं की जाएगी या पूरक कर लिया जाएगा । सदन या राज्य विघान मंडल के दोनों सदनो के समक्ष प्रस्तुत की जाएगी।
  3. जहां केन्द्र सरकार किसी सरकारी कम्पनी का सदस्य नहीं है, प्रत्येक राज्य सरकार (सरकारों) जो उस कम्पनी का सदस्य‍ है, कार्य पर तथा कम्पनी के मामलों पर एक वार्षिक रिपोर्ट बनाएगी (क) धारा 394(1) में वर्णित समय में तैयार किए जाएंगे तथा (ख) जितनी जल्दी् हो सके लेखापरीक्षा रिपोर्ट और टिप्प्णीयों पर अथवा पूरक की एक प्रति के साथ सदन अथवा राज्य विधायिका के दोनो सदनो के समक्ष रखने हेतु लेखापरीक्षा रिपोर्ट को उस धारा की उप-धारा(1) में संदर्भित है;
  4. धारा 394 तथा धारा 395 के प्रावधान, जहॉं तक हो सके, परिसमापन में सरकारी कम्पनी पर लागू होंगे जैसाकि वे अन्य किसी सरकारी कम्पनी पर लागू होते हैं।

संसद द्वारा स्थापित निगमो की लेखापरीक्षा

अधिनियम की धारा 19(2) संसद द्वारा स्थावपित निगमों के लेखाओं अथवा संसद द्वारा बनाए गए कानूनो के अन्तर्गत लेखापरीक्षा से संबंधित है। अधिनियम में प्रावधान है कि ऐसे निगमो की लेखापरीक्षा से सम्बंधित नियंत्रक-लेखापरीक्षक के कर्तव्यों तथा शक्तियों को उसके द्वारा सम्बन्धित विधायिकाओं के प्रावधानो के अनुरूप निष्पादित तथा लागू किया जाएगा। ऐसी ही स्थितति अधिनियम के लागू होने से पहले थी। इस धारा में प्रयुक्त ‘’विधान’’ शब्द‍ में न केवल निगमों कसे संबंधित मूल अधिनियम के प्रावधान से संबंधित है परन्तु संबंधित अधिनियमो के तहत उनमें निहित शक्ति‍यों के आधार पर सक्षम प्राधकरणों द्वारा बनाए गए नियमों तथा विनियमों से भी संबंधित है।

राज्यों द्वारा स्थापित निगमों की लेखापरीक्षा

संविधान के अन्ततर्गत केवल संसद विधि द्वारा नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के कर्तव्यों तथा शक्तियों को निर्धारित कर सकती है तथा इसीलिए, यह राज्य विधायिका की क्षमता में नहीं आता कि वह अपने द्वारा स्थापित किसी निगम के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा लेखापरीक्षा हेतु अधिनियन में प्रावधान करे।

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